हिन्दी (गद्य) · CBSE Class 10 · क्षितिज भाग 2 · भदंत आनंद कौसल्यायन (निबंध) · 25 क्विज़
संस्कृति — लेखक परिचय, निबंध का सार, मुख्य विचार एवं शब्दार्थ
लेखक परिचय
भदंत आनंद कौसल्यायन (जन्म सन् 1905, सोहाना गाँव, अंबाला, पंजाब — निधन सन् 1988) का बचपन का नाम हरनाम दास था। उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से बी.ए. किया। वे बौद्ध भिक्षु थे और उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अपना जीवन समर्पित कर दिया; लंबे समय तक गांधी जी के साथ वर्धा में रहे। अनन्य हिन्दी-सेवी कौसल्यायन ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन (प्रयाग) एवं राष्ट्रभाषा प्रचार समिति (वर्धा) के माध्यम से हिन्दी के प्रचार का महत्वपूर्ण कार्य किया। प्रमुख रचनाएँ — भिक्षु के पत्र, जो भूल ना सका, आह! ऐसी दरिद्रता, बहानेबाज़ी, यदि बाबा ना होते, रेल का टिकट, कहाँ क्या देखा तथा जातक कथाओं का अनुवाद। उनकी सरल-सहज बोलचाल की भाषा के निबंध एवं यात्रा-वृत्तांत काफी चर्चित रहे।
पाठ-परिचय
‘संस्कृति’ निबंध हमें सभ्यता एवं संस्कृति से जुड़े अनेक जटिल प्रश्नों से टकराने की प्रेरणा देता है। इसमें भदंत आनंद कौसल्यायन ने अनेक उदाहरण देकर यह बताने का प्रयास किया है कि सभ्यता एवं संस्कृति किसे कहते हैं — दोनों एक ही वस्तु हैं या अलग-अलग। वे सभ्यता को संस्कृति का परिणाम मानते हुए कहते हैं कि मानव-संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है। संस्कृति का बँटवारा करने वालों पर उन्हें आश्चर्य एवं दुख होता है। उनकी दृष्टि में जो मनुष्य के लिए कल्याणकारी नहीं, वह न सभ्यता है और न संस्कृति।
निबंध का सार
लेखक कहते हैं कि ‘सभ्यता’ एवं ‘संस्कृति’ दो ऐसे शब्द हैं जिनका उपयोग सबसे अधिक, पर समझ सबसे कम है। इन पर ‘भौतिक’, ‘आध्यात्मिक’ जैसे विशेषण लगने से अर्थ और गड़बड़ा जाता है। लेखक दो उदाहरणों से समझाते हैं — आग का आविष्कार एवं सुई-धागे का आविष्कार। जिस योग्यता, प्रवृत्ति या प्रेरणा के बल पर आग एवं सुई-धागे का आविष्कार हुआ, वह है संस्कृति; और उस संस्कृति द्वारा जो वस्तु आविष्कृत हुई, उसका नाम है सभ्यता।
जिस व्यक्ति की बुद्धि/विवेक ने किसी नए तथ्य का दर्शन (खोज) किया, वही वास्तविक संस्कृत व्यक्ति है; उसकी संतान, जिसे वह वस्तु अनायास मिल गई, सभ्य भले बन जाए, संस्कृत नहीं। उदाहरण — न्यूटन संस्कृत मानव था (गुरुत्वाकर्षण का आविष्कर्ता); आज का विज्ञान-विद्यार्थी न्यूटन से अधिक जानता (सभ्य) है, पर उतना संस्कृत नहीं।
संस्कृति की जननी केवल भौतिक प्रेरणा (पेट भरना, तन ढकना) नहीं, बल्कि ज्ञानेप्सा (ज्ञान की इच्छा) भी है — जैसे तारों को देखकर न सो सकने वाला मनीषी। इससे भी बढ़कर है वह कल्याण-भावना जो दूसरों के लिए त्याग कराती है — अपना कौर दूसरे को देना, बीमार बच्चे को रातभर गोद में लिए माँ, लेनिन का रोटी दूसरों को खिलाना, कार्ल मार्क्स का मज़दूरों हेतु दुख सहना, और सबसे बढ़कर सिद्धार्थ (बुद्ध) का मानवता के कल्याण हेतु गृह-त्याग।
लेखक कहते हैं — सभ्यता संस्कृति का परिणाम है (खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने, आवागमन, यहाँ तक कि परस्पर कट-मरने के तरीके सब सभ्यता हैं)। पर मानव की जो योग्यता आत्म-विनाश के साधन (हथियार) बनवाती है, वह संस्कृति नहीं, असंस्कृति है; उसका परिणाम असभ्यता ही होगा। अंततः मानव-संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है और उसमें जितना अंश कल्याण का है, वह अकल्याणकर की अपेक्षा श्रेष्ठ ही नहीं, स्थायी भी है।
शब्दार्थ
आध्यात्मिक = आत्मा/परमात्मा या मन से संबंध रखने वाला; साक्षात = प्रत्यक्ष, आँखों के सामने; आविष्कर्ता = आविष्कार करने वाला; परिष्कृत = शुद्ध/साफ किया हुआ; अनायास = बिना प्रयास, आसानी से; कदाचित = शायद, कभी; शीतोष्ण = ठंडा और गरम; निठल्ला = बेकार, खाली बैठा; मनीषी = विद्वान, विचारशील; वशीभूत = वश में/अधीन; तृष्णा = प्यास, लोभ; अवश्यंभावी = जिसका होना निश्चित हो; अविभाज्य = जो बाँटा न जा सके; ज्ञानेप्सा = ज्ञान की इच्छा।
प्रश्न-अभ्यास (सभी उत्तर — प्रश्न-अभ्यास + रचना-अभिव्यक्ति + भाषा-अध्ययन)
1लेखक की दृष्टि में ‘सभ्यता’ और ‘संस्कृति’ की सही समझ अब तक क्यों नहीं बन पाई है?
लेखक की दृष्टि में इसका कारण यह है कि ‘सभ्यता’ एवं ‘संस्कृति’ ऐसे शब्द हैं जिनका उपयोग सबसे अधिक, पर समझ सबसे कम है। इन दोनों शब्दों के साथ जब ‘भौतिक’, ‘आध्यात्मिक’ आदि अनेक विशेषण लग जाते हैं, तो जो थोड़ा-बहुत अर्थ समझ में आता है, वह भी गड़बड़ा जाता है। लोग इन्हें या तो एक ही मान लेते हैं या इनके भेद को लेकर भ्रमित रहते हैं — इसी कारण इनकी सही समझ अब तक नहीं बन पाई।
2आग की खोज एक बहुत बड़ी खोज क्यों मानी जाती है? इस खोज के पीछे रही प्रेरणा के मुख्य स्रोत क्या रहे होंगे?
आग की खोज बहुत बड़ी खोज इसलिए मानी जाती है क्योंकि इसने मानव-जीवन को पूरी तरह बदल दिया — इससे भोजन पकाना, ठंड से बचना एवं सुरक्षा संभव हुई; आज घर-घर चूल्हा जलता है। जिस व्यक्ति ने सबसे पहले आग का आविष्कार किया होगा, वह बहुत बड़ा आविष्कर्ता था। इस खोज के पीछे मुख्य प्रेरणा-स्रोत संभवतः पेट की ज्वाला (भूख) रही होगी।
3वास्तविक अर्थों में ‘संस्कृत व्यक्ति’ किसे कहा जा सकता है?
वास्तविक अर्थों में ‘संस्कृत व्यक्ति’ वह है जिसकी बुद्धि या विवेक ने किसी नए तथ्य का दर्शन (खोज/आविष्कार) किया हो — जो अपनी योग्यता, प्रवृत्ति या प्रेरणा के बल पर कोई नई चीज़ खोजता है। उसकी संतान, जिसे वह वस्तु अनायास (बिना प्रयास) पूर्वजों से मिल जाती है, सभ्य भले बन जाए, पर संस्कृत नहीं कहला सकती।
4न्यूटन को संस्कृत मानव कहने के पीछे कौन-से तर्क दिए गए हैं? न्यूटन द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों एवं ज्ञान की कई दूसरी बारीकियों को जानने वाले लोग भी न्यूटन की तरह संस्कृत क्यों नहीं कहला सकते?
न्यूटन को संस्कृत मानव इसलिए कहा गया क्योंकि उसने स्वयं अपनी बुद्धि एवं विवेक से गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत (एक नए तथ्य) का आविष्कार किया। आज के भौतिक विज्ञान के विद्यार्थी न्यूटन के सिद्धांत तथा उससे भी अधिक बातें जानते हैं, इसलिए उन्हें न्यूटन से अधिक ‘सभ्य’ तो कहा जा सकता है, पर ‘संस्कृत’ नहीं — क्योंकि वह ज्ञान उन्हें अनायास (तैयार रूप में, पूर्वजों से) मिल गया है; उन्होंने स्वयं किसी नए तथ्य की खोज नहीं की।
5किन महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सुई-धागे का आविष्कार हुआ होगा?
सुई-धागे का आविष्कार मुख्यतः इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ होगा — (i) शीत-उष्ण (ठंड-गर्मी) से बचने के लिए कपड़े सिलने/जोड़ने की आवश्यकता; तथा (ii) शरीर को सजाने एवं ढकने (सुंदर दिखने) की प्रवृत्ति। इन्हीं दो प्रमुख प्रवृत्तियों के कारण मनुष्य ने सुई-धागे का आविष्कार किया।
6‘मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है।’ किन्हीं दो प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जब — (क) मानव-संस्कृति को विभाजित करने की चेष्टाएँ की गईं। (ख) जब मानव-संस्कृति ने अपने एक होने का प्रमाण दिया।
(क) विभाजन की चेष्टाएँ: संस्कृति को ‘भौतिक’ एवं ‘आध्यात्मिक’ में बाँटना; तथा उसे भारतीय/पाश्चात्य या हिंदू/मुस्लिम संस्कृति आदि में विभाजित करना। (ख) एक होने के प्रमाण: दूसरे के मुँह में कौर डालने के लिए अपना कौर छोड़ देना; बीमार बच्चे को रातभर गोद में लिए रहने वाली माँ; लेनिन का रोटी के सूखे टुकड़े दूसरों को खिलाना; कार्ल मार्क्स का मज़दूरों के सुख हेतु जीवन दुख में बिताना; और सबसे बढ़कर सिद्धार्थ (बुद्ध) का मानवता के कल्याण हेतु गृह-त्याग — ये सब कल्याण-भावना की एकता के प्रमाण हैं।
7आशय स्पष्ट कीजिए — ‘मानव की जो योग्यता उससे आत्म-विनाश के साधनों का आविष्कार कराती है, हम उसे उसकी संस्कृति कहें या असंस्कृति?’
इसका आशय है कि मानव की जो योग्यता उससे विनाशकारी हथियारों (आत्म-विनाश के साधनों) का आविष्कार कराती है, उसे ‘संस्कृति’ नहीं कहा जा सकता। लेखक के अनुसार यदि संस्कृति का नाता कल्याण की भावना से टूट जाए, तो वह ‘असंस्कृति’ होकर ही रहेगी, और ऐसी संस्कृति का अवश्यंभावी परिणाम असभ्यता ही होगा। अर्थात् जो मानव-कल्याण के लिए नहीं है, वह न संस्कृति है और न सभ्यता।
8रचना-अभिव्यक्ति: लेखक ने अपने दृष्टिकोण से सभ्यता और संस्कृति की एक परिभाषा दी है। आप सभ्यता और संस्कृति के बारे में क्या सोचते हैं, लिखिए।
(नमूना) मेरे विचार में संस्कृति मनुष्य की वह आंतरिक योग्यता, सोच एवं मूल्य है जिससे वह नई खोजें करता है एवं जीवन को बेहतर बनाता है; जबकि सभ्यता उसी संस्कृति का बाहरी परिणाम है — हमारे रहन-सहन, साधन एवं आचरण के तरीके। सच्ची संस्कृति वही है जो मानव-कल्याण एवं भाईचारे से जुड़ी हो; जो विनाश की ओर ले जाए वह संस्कृति नहीं। (छात्र अपने विचार विस्तार से लिखें।)
9भाषा-अध्ययन: निम्नलिखित सामासिक पदों का विग्रह करके समास का भेद भी लिखिए — गलत-सलत, आत्म-विनाश, महामानव, पद-दलित, हिंदू-मुस्लिम, यथोचित, सप्तर्षि, सुलोचना।
गलत-सलत = गलत या सलत (ग़लत-वग़ैरह) → द्वंद्व समास। आत्म-विनाश = आत्मा (अपने) का विनाश → तत्पुरुष समास। महामानव = महान है जो मानव → कर्मधारय समास। पद-दलित = पद (पैरों) से दलित → तत्पुरुष समास (करण)। हिंदू-मुस्लिम = हिंदू और मुस्लिम → द्वंद्व समास। यथोचित = जो उचित हो (उचित के अनुसार) → अव्ययीभाव समास। सप्तर्षि = सात ऋषियों का समूह → द्विगु समास। सुलोचना = सुंदर हैं लोचन (आँखें) जिसके → बहुव्रीहि समास।