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क्षितिज पाठ 12: संस्कृति

गद्य खंड · पाठ 12 (अंतिम) · क्षितिज भाग 2

हिन्दी (गद्य) · CBSE Class 10 · क्षितिज भाग 2 · भदंत आनंद कौसल्यायन (निबंध) · 25 क्विज़

संस्कृति — लेखक परिचय, निबंध का सार, मुख्य विचार एवं शब्दार्थ

लेखक परिचय

भदंत आनंद कौसल्यायन (जन्म सन् 1905, सोहाना गाँव, अंबाला, पंजाब — निधन सन् 1988) का बचपन का नाम हरनाम दास था। उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से बी.ए. किया। वे बौद्ध भिक्षु थे और उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अपना जीवन समर्पित कर दिया; लंबे समय तक गांधी जी के साथ वर्धा में रहे। अनन्य हिन्दी-सेवी कौसल्यायन ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन (प्रयाग) एवं राष्ट्रभाषा प्रचार समिति (वर्धा) के माध्यम से हिन्दी के प्रचार का महत्वपूर्ण कार्य किया। प्रमुख रचनाएँ — भिक्षु के पत्र, जो भूल ना सका, आह! ऐसी दरिद्रता, बहानेबाज़ी, यदि बाबा ना होते, रेल का टिकट, कहाँ क्या देखा तथा जातक कथाओं का अनुवाद। उनकी सरल-सहज बोलचाल की भाषा के निबंध एवं यात्रा-वृत्तांत काफी चर्चित रहे।

पाठ-परिचय

‘संस्कृति’ निबंध हमें सभ्यता एवं संस्कृति से जुड़े अनेक जटिल प्रश्नों से टकराने की प्रेरणा देता है। इसमें भदंत आनंद कौसल्यायन ने अनेक उदाहरण देकर यह बताने का प्रयास किया है कि सभ्यता एवं संस्कृति किसे कहते हैं — दोनों एक ही वस्तु हैं या अलग-अलग। वे सभ्यता को संस्कृति का परिणाम मानते हुए कहते हैं कि मानव-संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है। संस्कृति का बँटवारा करने वालों पर उन्हें आश्चर्य एवं दुख होता है। उनकी दृष्टि में जो मनुष्य के लिए कल्याणकारी नहीं, वह न सभ्यता है और न संस्कृति।

निबंध का सार

लेखक कहते हैं कि ‘सभ्यता’ एवं ‘संस्कृति’ दो ऐसे शब्द हैं जिनका उपयोग सबसे अधिक, पर समझ सबसे कम है। इन पर ‘भौतिक’, ‘आध्यात्मिक’ जैसे विशेषण लगने से अर्थ और गड़बड़ा जाता है। लेखक दो उदाहरणों से समझाते हैं — आग का आविष्कार एवं सुई-धागे का आविष्कार। जिस योग्यता, प्रवृत्ति या प्रेरणा के बल पर आग एवं सुई-धागे का आविष्कार हुआ, वह है संस्कृति; और उस संस्कृति द्वारा जो वस्तु आविष्कृत हुई, उसका नाम है सभ्यता।

जिस व्यक्ति की बुद्धि/विवेक ने किसी नए तथ्य का दर्शन (खोज) किया, वही वास्तविक संस्कृत व्यक्ति है; उसकी संतान, जिसे वह वस्तु अनायास मिल गई, सभ्य भले बन जाए, संस्कृत नहीं। उदाहरण — न्यूटन संस्कृत मानव था (गुरुत्वाकर्षण का आविष्कर्ता); आज का विज्ञान-विद्यार्थी न्यूटन से अधिक जानता (सभ्य) है, पर उतना संस्कृत नहीं।

संस्कृति की जननी केवल भौतिक प्रेरणा (पेट भरना, तन ढकना) नहीं, बल्कि ज्ञानेप्सा (ज्ञान की इच्छा) भी है — जैसे तारों को देखकर न सो सकने वाला मनीषी। इससे भी बढ़कर है वह कल्याण-भावना जो दूसरों के लिए त्याग कराती है — अपना कौर दूसरे को देना, बीमार बच्चे को रातभर गोद में लिए माँ, लेनिन का रोटी दूसरों को खिलाना, कार्ल मार्क्स का मज़दूरों हेतु दुख सहना, और सबसे बढ़कर सिद्धार्थ (बुद्ध) का मानवता के कल्याण हेतु गृह-त्याग।

लेखक कहते हैं — सभ्यता संस्कृति का परिणाम है (खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने, आवागमन, यहाँ तक कि परस्पर कट-मरने के तरीके सब सभ्यता हैं)। पर मानव की जो योग्यता आत्म-विनाश के साधन (हथियार) बनवाती है, वह संस्कृति नहीं, असंस्कृति है; उसका परिणाम असभ्यता ही होगा। अंततः मानव-संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है और उसमें जितना अंश कल्याण का है, वह अकल्याणकर की अपेक्षा श्रेष्ठ ही नहीं, स्थायी भी है।

शब्दार्थ

आध्यात्मिक = आत्मा/परमात्मा या मन से संबंध रखने वाला; साक्षात = प्रत्यक्ष, आँखों के सामने; आविष्कर्ता = आविष्कार करने वाला; परिष्कृत = शुद्ध/साफ किया हुआ; अनायास = बिना प्रयास, आसानी से; कदाचित = शायद, कभी; शीतोष्ण = ठंडा और गरम; निठल्ला = बेकार, खाली बैठा; मनीषी = विद्वान, विचारशील; वशीभूत = वश में/अधीन; तृष्णा = प्यास, लोभ; अवश्यंभावी = जिसका होना निश्चित हो; अविभाज्य = जो बाँटा न जा सके; ज्ञानेप्सा = ज्ञान की इच्छा।

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