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पाठ 10: भारति जय विजय करे

काव्य खंड · पाठ 10 · गंगा

हिन्दी (काव्य) · CBSE Class 9 · गंगा · पाठ 10: भारति जय विजय करे (निराला) · 25 क्विज़

पाठ 10 — भारति जय विजय करे / निराला (कवि परिचय, मूल कविता, भावार्थ)

यह ‘गंगा’ (कक्षा 9) के काव्य खंड की तीसरी रचना है — सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की देश-प्रेम से ओत-प्रोत प्रेरणादायक कविता, जिसमें कवि भारत को विजयश्री प्राप्त करने की कामना करते हुए उसकी प्रकृति, कृषि-संपन्नता, ज्ञान व संस्कृति का भव्य व दिव्य चित्र खींचते हैं।

कवि परिचय — सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

जन्म सन् 1899, बंगाल के महिषादल में; मूलतः गढ़ाकोला (उन्नाव, उ.प्र.) के निवासी। औपचारिक शिक्षा नौवीं तक; स्वाध्याय से संस्कृत, बांग्ला व अंग्रेज़ी का ज्ञान अर्जित किया। प्रमुख काव्य-रचनाएँ — अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता, नए पत्ते। वे छायावाद के प्रमुख स्तंभ थे और छायावादियों में सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। उनके काव्य में दार्शनिकता, विद्रोह, क्रांति, प्रेम की तरलता व प्रकृति का विराट चित्र मिलता है; उपेक्षितों व पीड़ितों के प्रति गहरी सहानुभूति है। निधन सन् 1961।

मूल कविता

भारति, जय, विजय करे!
कनक-शस्य-कमलधरे!
लंका पदतल शतदल,
गर्जितोर्मि सागर-जल
धोता शुचि चरण-युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!
तरु-तृण-वन-लता-वसन,
अंचल में खचित सुमन;
गंगा ज्योतिर्जल-कण
धवल धार हार गले।
मुकुट श्रुभ हिम-तुषार,
प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!
भारति, जय, विजय करे!

भावार्थ

कवि भारत-माता (भारती) की जय-जयकार करते हुए उसकी विजय की कामना करता है। वह भारत को कनक-शस्य-कमलधरे (सोने जैसी फसलें व कमल धारण करने वाली) कहकर उसकी कृषि-संपन्नता का गुणगान करता है। कवि भारत को एक चेतन देवी के रूप में देखता है — लंका उसके चरणों का कमल (शतदल) है और गरजती लहरों वाला सागर उसके पवित्र चरण-युगल को धोता है, मानो अनेक अर्थों से भरी स्तुति कर रहा हो। वृक्ष, तृण, वन व लता उसके वस्त्र हैं, आँचल में फूल जड़े हैं, और गंगा की धवल, ज्योतिर्मय जलधारा उसके गले का श्वेत हार है। हिमालय की श्वेत बर्फ उसका मुकुट है, ‘ओंकार’ (प्रणव) उसके प्राण हैं, और उसकी उदार दिशाएँ सौ मुखों व सौ स्वरों से गूँज रही हैं (विविध स्वर, विचार व संस्कृति से समृद्ध)। इस प्रकार कवि भारत की विजय की कामना करता है।

मूल भाव: यह स्वतंत्रता-पूर्व लिखी राष्ट्र-भक्ति की कविता है जो भारत को ज्ञान, कृषि, प्रकृति व संस्कृति का प्रतीक मानकर उसकी विजय व गौरव की कामना करती है। भारत की भौगोलिक शोभा (हिमालय-मुकुट, गंगा-हार, सागर-चरण) को देवी के रूप में चित्रित करना इसका सौंदर्य है।

विधा व भाषा-शैली

यह छायावादी गीत/मुक्त छंद की संक्षिप्त, लयात्मक रचना है। भाषा संस्कृतनिष्ठ व समासयुक्त है (कनक-शस्य, ज्योतिर्जल, शतमुख-शतरव आदि सामासिक पद), जिसमें चित्रात्मकता व ओज है।

शब्द-संपदा (शब्दार्थ)

भारति/भारती = भारत-माता/सरस्वती; कनक = सोना; शस्य = फसल/उपज; कमलधरे = कमल धारण करने वाली; पदतल = पैरों के नीचे/तलवा; शतदल = कमल; गर्जितोर्मि = गरजती लहरें; शुचि = पवित्र; युगल = जोड़ा; स्तव = स्तुति/प्रशंसा; तरु = वृक्ष; तृण = घास/तिनका; वसन = वस्त्र; अंचल = आँचल; खचित = जड़ा हुआ; सुमन = फूल; ज्योतिर्जल = प्रकाशमय जल; धवल = सफ़ेद; श्रुभ/शुभ्र = उज्ज्वल/श्वेत; हिम-तुषार = बर्फ़; प्रणव/ओंकार = ‘ॐ’; उदार = विशाल/दानशील; शतमुख = सौ मुख; शतरव = सौ स्वर/ध्वनि; मुखरे = गूँजती/शब्द करती।

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