हिन्दी (काव्य) · CBSE Class 9 · गंगा · पाठ 12: घर की याद (भवानीप्रसाद मिश्र) · 25 क्विज़
पाठ 12 — घर की याद / भवानीप्रसाद मिश्र (कवि परिचय, सार, शब्दार्थ)
यह ‘गंगा’ (कक्षा 9) के काव्य खंड की पाँचवीं एवं अंतिम रचना है — भवानीप्रसाद मिश्र की हृदयस्पर्शी कविता, जो उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल में रहते हुए लिखी। परिवार की स्मृति ही इसकी केंद्रीय संवेदना है।
कवि परिचय — भवानीप्रसाद मिश्र
जन्म सन् 1913, होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम, म.प्र.)। स्वाधीनता-आंदोलन में सक्रिय भाग लेने वाले कवियों में प्रमुख — 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने पर तीन वर्ष का कारावास। उन्हें गांधीवादी विचारों व सहज, बोलचाल की भाषा के कारण ‘कविता का गांधी’ भी कहा जाता है। प्रमुख रचनाएँ — गीत-फ़रोश, खुशबू के शिलालेख, चकित है दुख, अँधेरी कविताएँ, बुनी हुई रस्सी, कालजयी। बुनी हुई रस्सी पर साहित्य अकादमी पुरस्कार। ‘कल्पना’ पत्रिका व संपूर्ण गांधी वाङ्मय का संपादन किया; आकाशवाणी से भी जुड़े रहे। निधन सन् 1985।
कविता का सार / मूल भाव
जेल में लगातार बरसते सावन के पानी को देखकर कवि को अपना घर याद आता है। उसकी स्मृति में परिजन एक-एक कर उभरते हैं — चार भाई, चार बहनें, अनपढ़ पर स्नेहमयी माँ (जिसे पत्र लिखना नहीं आता), तथा वज्र-सी भुजाओं पर मक्खन-से कोमल हृदय वाले वीर पिता (जिन पर बुढ़ापा असर नहीं करता, जो गीता-पाठ व कसरत करते हैं)। कवि अनुभव करता है कि वह ‘पाँचवाँ’ (अभागा) बेटा जेल में बँधा है, जिससे पिता दुखी होकर रो पड़े होंगे। कवि सावन के बादल को संदेशवाहक बनाकर आग्रह करता है कि वह घरवालों को उसके जेल के कष्ट न बताए, बल्कि यही कहे कि ‘मैं मस्त हूँ, पढ़ता-लिखता व कातता हूँ, मज़े में हूँ’ — ताकि माता-पिता दुखी न हों। इस तरह कवि अपनी पीड़ा छिपाकर परिवार को सांत्वना देना चाहता है।
केंद्रीय संवेदना: ‘घर’ यहाँ केवल भवन नहीं, बल्कि भावनाओं व संबंधों का केंद्र है। कविता में देश-प्रेम (जेल-यात्रा), पारिवारिक स्नेह, वियोग की पीड़ा और अपनों को दुख से बचाने की कोमल भावना एक साथ व्यक्त होती है। ‘दुख डटकर ठेलता हूँ’ कवि के संघर्षशील, धीर स्वभाव को दर्शाता है।
विधा व शैली
यह आत्म-कथात्मक, भावात्मक मुक्त-लय गीत है। भाषा सहज, लोक-बोली से युक्त व संबोधनात्मक है; ध्वन्यात्मक/नाद-सौंदर्य (झरा-झर, थर-थर, सर-सर) इसकी बड़ी विशेषता है। प्रकृति (सावन) के माध्यम से भावों की अभिव्यक्ति हुई है।
‘घर की याद’ के ‘मेरे उत्तर मेरे तर्क’, ‘मेरी समझ मेरे विचार’, कविता की संरचना (भावों की यात्रा) एवं व्याकरण (स्थानीय शब्द, व्याकरणिक पहचान) के पूर्ण उत्तर।
1मेरे उत्तर मेरे तर्क — भवानीप्रसाद मिश्र ने यह कविता कहाँ और क्यों लिखी?
(ग) जेल से परिवार के लिए। कवि ने यह कविता 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कारावास में रहते हुए लिखी, जब बरसते सावन में उन्हें अपने घर व परिवार की तीव्र याद आई।
2लगातार बरसता पानी कवि के मन की किस भावना का परिचायक है?
(घ) चिंता और बेचैनी। लगातार बरसता पानी कवि की भीतरी उदासी, घर की याद से उपजी व्याकुलता व बेचैनी का प्रतीक है — ‘प्राण मन घिरता रहा है’, ‘काँपते हैं प्राण थर-थर’।
3कविता में माँ की कैसी छवि उभरती है?
(ख) स्नेहमयी और दृढ़। माँ अनपढ़ है पर अत्यंत स्नेहमयी (‘जिसकी गोद में सिर रख लिया तो दुख नहीं फिर’) और भीतर से दृढ़ है — वह कहती है ‘आँख में किसलिए पानी, वहाँ अच्छा है भवानी…पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता’ — यानी बेटे के देश-हित निर्णय पर गर्व करती है।
4“वज्र-भुज नवनीत-सा उर” पंक्ति पिता के व्यक्तित्व की कैसी छवि प्रस्तुत करती है?
(ग) दृढ़ और संवेदनशील। ‘वज्र-भुज’ = वज्र-सी कठोर/बलशाली भुजाएँ (दृढ़ता) और ‘नवनीत-सा उर’ = मक्खन-सा कोमल हृदय (संवेदनशीलता) — पिता बाहर से कठोर व वीर, भीतर से कोमल व भावुक हैं।
5“एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” पंक्ति किस ओर संकेत करती है?
(ख) पिता की भावुकता। पिता का मन बरगद (बड़) के विशाल वृक्ष जैसा है — एक पत्ता टूटने पर ही (ज़रा-सी बात पर) उनकी आँखों से आँसुओं की धारा फूट पड़ती है; यह उनके अत्यंत भावुक व कोमल हृदय को दर्शाता है।
6“बहिन आई बाप के घर, हाय रे परिताप के घर” में ‘परिताप’ शब्द से क्या संकेत मिलता है?
(ग) घर में दुख का वातावरण। ‘परिताप’ = अत्यधिक दुख/शोक; बहन मायके आई है पर घर में (कवि के जेल में होने के कारण) दुख व पीड़ा का वातावरण छाया है।
7“और कहना मस्त हूँ मैं” — कवि का ऐसा कहना किस बात की ओर संकेत करता है?
(ख) अपने दुख को परिजनों से छिपाना चाहता है। कवि जेल के कष्टों के बावजूद बादल से कहता है कि घरवालों को यही बताना कि ‘मैं मस्त व मज़े में हूँ’ — ताकि माता-पिता दुखी न हों; यह उसका परिवार के प्रति कोमल, त्यागपूर्ण प्रेम है।
8इस कविता में किस बात को प्रमुखता से वर्णित किया गया है?
(घ) घर की याद और अकेलेपन की पीड़ा। जेल में अकेले कवि को बरसते सावन में घर, परिवार व अपनों की तीव्र याद आती है — यही अकेलेपन व वियोग की पीड़ा कविता का केंद्रीय विषय है।
MSमेरी समझ मेरे विचार
1. पिता का बहुआयामी व्यक्तित्व: वे ‘भोले-बहादुर’ हैं — वज्र-सी भुजाएँ पर मक्खन-सा कोमल हृदय; बुढ़ापा उन पर असर नहीं करता (दौड़ते, खिलखिलाते हैं); मौत व शेर के आगे भी नहीं डरते; बोल में बादल-सा गरजते व काम में आँधी-सा जोश रखते हैं; नित्य गीता-पाठ व कसरत (दो सौ साठ दंड, मुगदर) करते हैं; और भीतर से इतने भावुक कि बेटे की याद में रो पड़ते हैं। 2. “दुख डटकर ठेलता हूँ” — कवि कठिन परिस्थिति (जेल, वियोग) में भी धैर्य व साहस नहीं खोता; वह अपने दुख को दबाकर परिवार को सांत्वना देना चाहता है, और देश-हित के लिए कारावास का कष्ट त्यागपूर्वक सहता है — यही उसका संघर्षशील, धीर व त्यागी स्वभाव है। 3. बार-बार वर्षा का वर्णन कवि के भीतरी भावों का दर्पण है — बरसता पानी उसकी उदासी, घर की याद व बेचैनी को प्रकट करता है; पानी थमने पर मन का ‘नम’ होना (भावुकता) तथा बादलों का ‘माँ के लीपे आँगन-सा’ लगना स्मृति-भावों को और गहरा करता है। 4. माँ की भावनात्मक मजबूती: “इस तरह होओ न कच्चे, रो पड़ेंगे और बच्चे”, “पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता” — इन पंक्तियों से पता चलता है कि माँ भीतर से दुखी होकर भी दृढ़ है; वह बेटे को कमज़ोर न पड़ने की प्रेरणा देती है और उसके देश-हित निर्णय पर गर्व करती है। 5. (विद्यार्थी-सापेक्ष) — प्रायः पिता वाला अंश (‘वज्र-भुज नवनीत-सा उर’, ‘एक पत्ता टूट जाए…’) व बादल को दूत बनाकर दुख छिपाने का आग्रह (‘और कहना मस्त हूँ मैं’) सर्वाधिक भावप्रवण लगता है, क्योंकि इसमें वीरता व कोमलता तथा त्याग व प्रेम एक साथ झलकते हैं।
SRकविता की संरचना — भावों की यात्रा
कविता भावों की एक यात्रा है — (1) रात-भर पानी गिरना व मन का घिरना (उदासी का आरंभ); (2) धुँधला सबेरा व घर का नज़र में तिरना (स्मृति-जागरण); (3) भाई-बहनों, माँ व पिता का एक-एक कर याद आना (स्मृति-विस्तार); (4) ‘पाँचवें अभागे’ के रूप में स्वयं का बोध व घर के दुख की कल्पना (पीड़ा का चरम); (5) पानी थमना व मन का नम होना (भावुकता); (6) बादल को दूत बनाकर दुख छिपाने व सांत्वना का आग्रह (संयम व त्याग)।
उच्च-स्तरीय चिंतन, विश्लेषण एवं मूल्यपरक प्रश्न (CBSE शैली)।
1कवि ने सावन के बादल को संदेशवाहक (दूत) क्यों बनाया है? इसका काव्य-सौंदर्य बताइए। (HOTS)
कवि जेल में बंद है, इसलिए वह स्वयं घर संदेश नहीं पहुँचा सकता — अतः वह सर्वत्र पहुँचने वाले, घर की ओर बरसने वाले सावन के बादल को दूत बनाता है। यह कालिदास की ‘मेघदूत’ परंपरा से जुड़ी सुंदर काव्य-कल्पना है; इससे प्रकृति व मानव-भावना का अटूट जुड़ाव प्रकट होता है और कविता में कोमलता, प्रतीकात्मकता व भावुकता भर जाती है।
2“तुम बरस लो वे न बरसें, पाँचवें को वे न तरसें” — इस आग्रह में कवि की कौन-सी मनोदशा झलकती है? (HOTS)
इसमें कवि का त्यागपूर्ण व कोमल पुत्र-हृदय झलकता है। वह चाहता है कि बादल तो खूब बरसे (संदेश ले जाए), पर उसके माता-पिता (वे) आँसू न बरसाएँ और पाँचवें बेटे (स्वयं) के लिए न तरसें। कवि अपनी पीड़ा छिपाकर केवल अपने परिवार के सुख व धैर्य की कामना करता है — यह आत्म-त्याग व गहन पारिवारिक प्रेम की पराकाष्ठा है।
3ध्वन्यात्मक शब्दों (झरा-झर, थर-थर, सर-सर) का कविता में क्या प्रभाव है? (विश्लेषण)
ये अनुकरणात्मक/ध्वन्यात्मक शब्द कविता में नाद-सौंदर्य व सजीव वातावरण उत्पन्न करते हैं — ‘झरा-झर’ से पानी गिरने, ‘हरा-हर’ से पत्तों के हिलने, ‘सर-सर’ से हवा बहने और ‘थर-थर’ से प्राणों के काँपने का दृश्य व ध्वनि दोनों साकार हो जाते हैं। इससे पाठक वर्षा-भीगे वातावरण व कवि की बेचैनी को प्रत्यक्ष अनुभव करता है।
4कविता में ‘घर’ एक भौतिक स्थान से बढ़कर है — सिद्ध कीजिए। (HOTS)
कविता में ‘घर’ ईंट-गारे का भवन नहीं, बल्कि भावनाओं व संबंधों का केंद्र है — भाई-बहनों की हँसी, माँ की स्नेह-गोद, पिता का वात्सल्य, पारिवारिक जुड़ाव। कवि को जेल में भवन नहीं, बल्कि इन्हीं रिश्तों की कमी खलती है। इससे सिद्ध होता है कि ‘घर’ का असली अर्थ उसमें रहने वाले प्रियजन व उनका स्नेह है, न कि दीवारें।
5संयुक्त परिवार व एकल परिवार की तुलना करते हुए इस कविता की प्रासंगिकता पर विचार लिखिए। (मूल्यपरक/सृजन)
उत्तर विद्यार्थी-सापेक्ष। मुख्य बिंदु — कविता का घर एक संयुक्त परिवार है (चार भाई, चार बहनें, माता-पिता, भाभी), जहाँ स्नेह, सहारा व अपनापन है। संयुक्त परिवार में सुरक्षा, सहयोग व मूल्यों का संस्कार मिलता है, पर निजता कम होती है; एकल परिवार में स्वतंत्रता व निजता अधिक, पर अकेलापन व सहारे की कमी हो सकती है। आज बढ़ते एकल-चलन में यह कविता पारिवारिक प्रेम व जुड़ाव के महत्व की याद दिलाकर और भी प्रासंगिक हो जाती है।
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