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पाठ 2: क्या लिखूँ?

गद्य खंड · पाठ 2 · गंगा

हिन्दी (गद्य) · CBSE Class 9 · गंगा · पाठ 2: क्या लिखूँ? (बख्शी) · 25 क्विज़

पाठ 2 — क्या लिखूँ? (लेखक परिचय, सार, शब्दार्थ)

यह पाठ नई NCERT पाठ्यपुस्तक ‘गंगा’ (कक्षा 9) के गद्य खंड का दूसरा पाठ है। यह एक आत्मपरक निबंध है, जिसमें लेखक स्वयं पाठक से संवाद करते हुए निबंध-लेखन की प्रक्रिया और उसकी कठिनाइयों को रोचक ढंग से समझाते हैं।

लेखक परिचय — पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

जन्म सन् 1894, खैरागढ़ (छत्तीसगढ़)। हिन्दी साहित्य में इनकी ख्याति कुशल आलोचक, कवि, निबंधकार एवं हास्य-व्यंग्यकार के रूप में है; निबंध-लेखन के लिए विशेष रूप से स्मरणीय। इन्होंने ‘सरस्वती’ और ‘छाया’ पत्रिकाओं का संपादन किया। प्रमुख रचनाएँ — पंच-पात्र, पदम-वन, प्रबंध पारिजात, कुछ बिखरे पन्ने (निबंध)। निधन सन् 1971।

पाठ-सार

लेखक को अपनी छात्राओं नमिता (विषय: ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’) और अमिता (विषय: ‘समाज-सुधार’) के लिए दो आदर्श निबंध लिखने हैं, ताकि वे उन्हें निबंध-रचना का रहस्य समझा सकें। अंग्रेज़ी निबंधकार ए.जी. गार्डिनर के अनुसार लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है जब मन में उमंग उठती है और लेख अपने आप लिखा जाता है — विषय गौण है, असली वस्तु तो मन के भाव हैं (जैसे हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है — असली वस्तु हैट है, खूँटी नहीं)।

लेखक कहते हैं कि उन्हें ऐसी सहज स्थिति का अनुभव नहीं होता — उन्हें सोचना, चिंता करनी और परिश्रम करना पड़ता है। वे निबंधशास्त्र के आचार्यों की राय देखते हैं — निबंध छोटा हो, उसके दो अंग हैं सामग्री और शैली, पहले रूपरेखा बने, भाषा में प्रवाह हो और वाक्य छोटे पर सुसंबद्ध हों। अंत में वे अंग्रेज़ी निबंधकार मानटेन (Montaigne) की पद्धति अपनाने का निश्चय करते हैं — जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया उसी को स्वच्छंद रूप से सच्ची अनुभूति के साथ लिख देना।

अमीर खुसरो की कहानी (चार स्त्रियों की चार माँगों — खीर, चरखा, कुत्ता, ढोल — को एक ही पद में पूरा करना) से प्रेरित होकर लेखक दोनों विषयों को एक ही निबंध में समाहित कर देते हैं:

  • दूर के ढोल सुहावने: ढोल की कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती; दूरी से वही कठोर स्वर मधुर लगते हैं। दूर रहने से यथार्थ की कठोरता का अनुभव नहीं होता — इसलिए तरुण को भविष्य उज्ज्वल और वृद्ध को अतीत सुखद लगता है; दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं।
  • समाज-सुधार: मानव-इतिहास में कोई काल ऐसा नहीं रहा जब सुधारकों की आवश्यकता न हुई हो (बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, दयानंद, गांधी…)। नए दोष जन्मते हैं, नए सुधार होते हैं — इसी से जीवन प्रगतिशील है।
मूल भाव: निबंध का सौंदर्य विषय में नहीं, लेखक की सच्ची अनुभूति और भावों की सहज अभिव्यक्ति में है। आत्मपरक, संवादात्मक शैली इस निबंध को जीवंत बनाती है।

विधा — निबंध

‘निबंध’ का शाब्दिक अर्थ है ‘भली-भाँति बँधा हुआ’ (नि+बंध)। यह गद्य की वह विधा है जिसमें रचनाकार किसी विषय पर अपने अनुभव, विचार और भावनाओं को तार्किक, क्रमबद्ध और साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करता है।

शब्द-संपदा (शब्दार्थ)

स्फूर्ति = फुरती, उत्तेजना; आवेग = बिना सोचे कुछ कर बैठने की अंतःप्रेरणा, झोंक; यथार्थ = सत्य, उचित; रहस्य = गुप्तभेद, मर्म; विज्ञ = जानकार, विद्वान; सम्मति = राय, मत; अनुसंधान = खोज, जाँच-पड़ताल; दुर्बोध = जो शीघ्र समझ में न आए; गांभीर्य = गंभीरता, गहराई; गुत्थी = उलझन, गाँठ; पद्धति = प्रणाली, मार्ग; पाश्चात्य = पश्चिम का; उदात्त = ऊँचा, श्रेष्ठ; कलरव = मधुर ध्वनि; विषाद = उदासी।

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