पाठ 2 — क्या लिखूँ? (लेखक परिचय, सार, शब्दार्थ)
यह पाठ नई NCERT पाठ्यपुस्तक ‘गंगा’ (कक्षा 9) के गद्य खंड का दूसरा पाठ है। यह एक आत्मपरक निबंध है, जिसमें लेखक स्वयं पाठक से संवाद करते हुए निबंध-लेखन की प्रक्रिया और उसकी कठिनाइयों को रोचक ढंग से समझाते हैं।
लेखक परिचय — पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
जन्म सन् 1894, खैरागढ़ (छत्तीसगढ़)। हिन्दी साहित्य में इनकी ख्याति कुशल आलोचक, कवि, निबंधकार एवं हास्य-व्यंग्यकार के रूप में है; निबंध-लेखन के लिए विशेष रूप से स्मरणीय। इन्होंने ‘सरस्वती’ और ‘छाया’ पत्रिकाओं का संपादन किया। प्रमुख रचनाएँ — पंच-पात्र, पदम-वन, प्रबंध पारिजात, कुछ बिखरे पन्ने (निबंध)। निधन सन् 1971।
पाठ-सार
लेखक को अपनी छात्राओं नमिता (विषय: ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’) और अमिता (विषय: ‘समाज-सुधार’) के लिए दो आदर्श निबंध लिखने हैं, ताकि वे उन्हें निबंध-रचना का रहस्य समझा सकें। अंग्रेज़ी निबंधकार ए.जी. गार्डिनर के अनुसार लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है जब मन में उमंग उठती है और लेख अपने आप लिखा जाता है — विषय गौण है, असली वस्तु तो मन के भाव हैं (जैसे हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है — असली वस्तु हैट है, खूँटी नहीं)।
लेखक कहते हैं कि उन्हें ऐसी सहज स्थिति का अनुभव नहीं होता — उन्हें सोचना, चिंता करनी और परिश्रम करना पड़ता है। वे निबंधशास्त्र के आचार्यों की राय देखते हैं — निबंध छोटा हो, उसके दो अंग हैं सामग्री और शैली, पहले रूपरेखा बने, भाषा में प्रवाह हो और वाक्य छोटे पर सुसंबद्ध हों। अंत में वे अंग्रेज़ी निबंधकार मानटेन (Montaigne) की पद्धति अपनाने का निश्चय करते हैं — जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया उसी को स्वच्छंद रूप से सच्ची अनुभूति के साथ लिख देना।
अमीर खुसरो की कहानी (चार स्त्रियों की चार माँगों — खीर, चरखा, कुत्ता, ढोल — को एक ही पद में पूरा करना) से प्रेरित होकर लेखक दोनों विषयों को एक ही निबंध में समाहित कर देते हैं:
- दूर के ढोल सुहावने: ढोल की कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती; दूरी से वही कठोर स्वर मधुर लगते हैं। दूर रहने से यथार्थ की कठोरता का अनुभव नहीं होता — इसलिए तरुण को भविष्य उज्ज्वल और वृद्ध को अतीत सुखद लगता है; दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं।
- समाज-सुधार: मानव-इतिहास में कोई काल ऐसा नहीं रहा जब सुधारकों की आवश्यकता न हुई हो (बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, दयानंद, गांधी…)। नए दोष जन्मते हैं, नए सुधार होते हैं — इसी से जीवन प्रगतिशील है।
मूल भाव: निबंध का सौंदर्य विषय में नहीं, लेखक की सच्ची अनुभूति और भावों की सहज अभिव्यक्ति में है। आत्मपरक, संवादात्मक शैली इस निबंध को जीवंत बनाती है।
विधा — निबंध
‘निबंध’ का शाब्दिक अर्थ है ‘भली-भाँति बँधा हुआ’ (नि+बंध)। यह गद्य की वह विधा है जिसमें रचनाकार किसी विषय पर अपने अनुभव, विचार और भावनाओं को तार्किक, क्रमबद्ध और साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करता है।
शब्द-संपदा (शब्दार्थ)
स्फूर्ति = फुरती, उत्तेजना; आवेग = बिना सोचे कुछ कर बैठने की अंतःप्रेरणा, झोंक; यथार्थ = सत्य, उचित; रहस्य = गुप्तभेद, मर्म; विज्ञ = जानकार, विद्वान; सम्मति = राय, मत; अनुसंधान = खोज, जाँच-पड़ताल; दुर्बोध = जो शीघ्र समझ में न आए; गांभीर्य = गंभीरता, गहराई; गुत्थी = उलझन, गाँठ; पद्धति = प्रणाली, मार्ग; पाश्चात्य = पश्चिम का; उदात्त = ऊँचा, श्रेष्ठ; कलरव = मधुर ध्वनि; विषाद = उदासी।
अभ्यास — सभी प्रश्न-उत्तर
‘क्या लिखूँ?’ के ‘मेरे उत्तर मेरे तर्क’, ‘मेरी समझ मेरे विचार’, भाव-विस्तार एवं व्याकरण (समास, उपसर्ग-प्रत्यय, पर्यायवाची) के पूर्ण उत्तर।
1मेरे उत्तर मेरे तर्क — “हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी…असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं।” यह किस भाव को उजागर करता है?
(क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना। हैट = मन के भाव (असली वस्तु), खूँटी = विषय (केवल आधार) — अर्थात् निबंध में विषय गौण है, लेखक के भाव ही प्रधान हैं।
2मानटेन की पद्धति लेखक के लिए किस निर्णय का आधार बनती है?
(घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना। मानटेन ने जो देखा-सुना-अनुभव किया उसी को सच्ची अनुभूति के साथ लिखा; इसी से प्रेरित होकर लेखक भी स्वच्छंद, आत्मपरक निबंध लिखने का निश्चय करते हैं।
3“तरुणों के लिए भविष्य उज्ज्वल… वृद्धों के लिए अतीत सुखद…” — यह तुलना किस पर आधारित है?
(घ) अभिलाषा और अनुभव। तरुण की दृष्टि अभिलाषा (भविष्य की ओर) और वृद्ध की दृष्टि अनुभव (अतीत की ओर) पर टिकी है; दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं।
4निबंध में अमीर खुसरो की कहानी किस संदर्भ में आई है?
(ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए। खुसरो ने एक ही पद में चार माँगें पूरी कीं; इसी तरह लेखक दोनों निबंध-विषयों को एक ही निबंध में समेट लेते हैं।
5निबंध में समाज-सुधार के संदर्भ में क्या कहा गया है?
(क) सुधारकों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है। मानव-इतिहास में कोई काल सुधारों से रहित नहीं रहा; नए दोष जन्मते हैं और नए सुधार होते हैं — इसी से जीवन प्रगतिशील है।
MSमेरी समझ मेरे विचार — (कक्षा-चर्चा के प्रश्न)
1. गार्डिनर व लेखक के विचारों में अंतर: गार्डिनर के लिए लेखन एक सहज मानसिक स्थिति में अपने आप हो जाता है; लेखक को सोचना, चिंता करनी और परिश्रम करना पड़ता है। 2. वृद्ध व तरुण की असंतुष्टि के कारण: तरुण वर्तमान से असंतुष्ट हैं क्योंकि वे भविष्य के परिवर्तन को शीघ्र लाना चाहते हैं; वृद्ध असंतुष्ट हैं क्योंकि वे अतीत के गौरव को वर्तमान में देखना चाहते हैं। 3. नमिता–अमिता के विषय व कठिनाइयाँ: नमिता — ‘दूर के ढोल सुहावने’, अमिता — ‘समाज-सुधार’; कठिनाई — सीमित समय, सामग्री व संदर्भ-ग्रंथ का अभाव, और रूपरेखा बनाना। 4. आदर्श निबंध की युक्तियाँ: निबंध छोटा हो, पहले रूपरेखा बने, सामग्री-संग्रह व मनन हो, भाषा में प्रवाह हो, वाक्य छोटे पर सुसंबद्ध हों। 5. देखने-सुनने-अनुभव करने की उपयोगिता: इनसे लेखक के पास सच्ची, मौलिक सामग्री आती है जिससे लेखन जीवंत, आत्मीय और प्रभावशाली बनता है।
BVभाव-विस्तार — पाठ के वाक्यों का विस्तार
• “जो तरुण जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र मनमोहक लगता है।” — जिसने कठिनाइयों का सामना नहीं किया, उसे जीवन सरल व सुंदर दिखता है; वास्तविक संघर्ष का अनुभव न होने से यथार्थ की कठोरता छिप जाती है। • “मनुष्य-जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल नहीं हुआ जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।” — हर युग में कुछ दोष व कुरीतियाँ रहीं, इसलिए हर युग को सुधारकों की ज़रूरत पड़ी। • “छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है।” — संक्षिप्त निबंध में रचना की सुंदरता व कसावट बनी रहती है, विस्तार में वह बिखर जाती है।
VY1व्याकरण — समास (पाठ के सामासिक पदों का विग्रह व भेद)
समास = दो या अधिक शब्दों के मेल से एक नए शब्द की रचना। उदाहरण: निबंधशास्त्र = निबंध का शास्त्र — तत्पुरुष; समाज-सुधार = समाज का सुधार — तत्पुरुष; जीवन-संग्राम = जीवन का संग्राम — तत्पुरुष; नव-वधू = नई वधू — कर्मधारय; विवाहोत्सव = विवाह का उत्सव — तत्पुरुष। छह भेद — तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, बहुव्रीहि, द्वंद्व, अव्ययीभाव।
VY2व्याकरण — उपसर्ग एवं प्रत्यय
उपसर्ग (शब्द के आरंभ में): दुर्+बोध = दुर्बोध; अन्+आदि = अनादि; वि+षाद = विषाद। प्रत्यय (शब्द के अंत में): सुधार+क = सुधारक; कठिन+आई = कठिनाई; मधुर+ता = मधुरता। रिक्त स्थान — ‘कठिन…’ → कठिनाई; ‘…संतोष’ → असंतोष; ‘…स्पष्ट…’ → अस्पष्टता; ‘…बोध…’ → दुर्बोधता।
VY3भाव — एक शब्द अनेक (पर्यायवाची)
पाठ में परस्पर मिलते-जुलते अर्थ वाले शब्द — विचार–मनन–चिंतन; सुहावने–मधुर–मनमोहक; यथार्थ–सत्य–प्रकृत; रहस्य–गुप्तभेद–मर्म; विज्ञ–जानकार–विद्वान। (इन्हें अलग-अलग वाक्यों में प्रयोग कर अर्थ स्पष्ट कीजिए।)