AllBoardSolutionFREE

पाठ 8: पद (रैदास)

काव्य खंड · पाठ 8 · गंगा

हिन्दी (काव्य) · CBSE Class 9 · गंगा · पाठ 8: पद (रैदास) · 25 क्विज़

पाठ 8 — पद / रैदास (कवि परिचय, मूल पद, भावार्थ)

यह ‘गंगा’ (कक्षा 9) के काव्य खंड की पहली रचना है — संत कवि रैदास (रविदास) के दो पद, जो अनन्य भक्ति, आराध्य के प्रति अटूट समर्पण और अडिग निष्ठा का भाव प्रकट करते हैं।

कवि परिचय — रैदास (रविदास)

रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ; जीवन-काल 15वीं शताब्दी (सन् 1388–1518) माना जाता है। वे संत कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने बाह्य आडंबरों का खंडन कर मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को ही सच्चा धर्म माना। उनकी भाषा सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा है जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली व उर्दू-फ़ारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। उनकी कुछ रचनाएँ श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं और आज भी समानता, प्रेम व भाईचारे का संदेश देती हैं। उनकी रचनाएँ ‘रैदास बानी’ में संकलित हैं।

दोनों पदों का मूल भाव: पहले पद में रैदास चंदन-पानी, बादल-मोर, दीपक-बाती, मोती-धागा जैसी उपमाओं से बताते हैं कि जैसे इनका संबंध अटूट है, वैसे ही भक्त व आराध्य अलग नहीं हो सकते — यह अनन्य भक्ति व समर्पण है। दूसरे पद में वे कहते हैं कि वे तीर्थ-व्रत छोड़ सकते हैं पर प्रभु-चरणों की भक्ति नहीं — यह निष्ठा, विश्वास व अडिग भक्ति को व्यंजित करता है।

पद (1) — मूल पाठ

अब कैसे छूटै राम रट लागी।
प्रभुजी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी॥
प्रभुजी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभुजी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभुजी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा॥
प्रभुजी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा॥

पद (1) — भावार्थ

रैदास कहते हैं कि अब राम-नाम जपने की जो रट (धुन) लग गई है, वह कैसे छूटे! फिर वे भक्त और आराध्य के अटूट संबंध को उपमाओं से समझाते हैं — हे प्रभु! आप चंदन हैं, मैं पानी — जैसे चंदन की सुगंध पानी के अंग-अंग में समा जाती है। आप बादल हैं, मैं मोर — जैसे चकोर पक्षी चाँद को निहारता रहता है। आप दीपक हैं, मैं बाती — जिसकी ज्योति दिन-रात जलती रहती है। आप मोती हैं, मैं धागा — जैसे सोने में सुहागा मिलता है (और उसकी चमक बढ़ती है)। आप स्वामी हैं, मैं दास — रैदास ऐसी ही (अनन्य) भक्ति करते हैं।

पद (2) — मूल पाठ

जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौं, तुम सौं तोरि कवन सौं जोरौं।
तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां॥
जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव और नहिं दूजा॥
मैं अपनो मन हरि सौं जोरौं, हरि सौं जोरि सबन सौं तोरौं॥
सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा॥

पद (2) — भावार्थ

रैदास कहते हैं — हे राम! यदि आप मुझसे नाता तोड़ भी दें, तो भी मैं नहीं तोड़ूँगा; आपसे संबंध तोड़कर भला मैं किससे जोड़ूँ? मुझे तीर्थ न करने या व्रत न रखने की कोई चिंता (अंदेसा) नहीं — मुझे तो बस आपके चरण-कमलों का एक ही भरोसा है। मैं जहाँ भी जाता हूँ, वहीं आपकी ही पूजा है; आप जैसा दूसरा कोई देव नहीं। मैंने अपना मन हरि से जोड़ लिया है और हरि से जोड़कर बाकी सबसे (सांसारिक मोह से) तोड़ लिया है। हर पहर मुझे आपकी ही आस है — रैदास यह मन, कर्म व वचन (तीनों) से कहते हैं।

विधा — पद (भक्ति-काव्य)

‘पद’ भक्ति-काल की एक गेय काव्य-विधा है — छोटे, लयात्मक व संगीतमय छंद जिन्हें गाया जाता है। रैदास निर्गुण भक्ति-धारा के संत कवि हैं जो निराकार आराध्य व आंतरिक भक्ति पर बल देते हैं।

शब्द-संपदा (शब्दार्थ)

रट = धुन/बार-बार जपना; बास = गंध/सुगंध; समानी = समा गई; घन = बादल; मोरा = मोर; चितवत = निहारना/देखना; चकोरा = चकोर (चाँद का प्रेमी पक्षी); जोति = ज्योति/प्रकाश; बरै = जलती है; राती = रात; सुहागा = एक खनिज जो सोने की शुद्धता व चमक बढ़ाता है; तोरौं = तोड़ूँ; जोरौं = जोड़ूँ; अंदेसा = चिंता/संशय; भरोसां = विश्वास/आश्रय; दूजा = दूसरा; आसा = आशा/आस; मन-क्रम-वचन = मन, कर्म व वाणी तीनों से।

📲 Join our WhatsApp Channel

Get free daily notes, new chapter solutions, model question papers & exam updates — straight on your phone.

Follow on WhatsApp →