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क्षितिज पाठ 7: नेताजी का चश्मा

गद्य खंड · पाठ 7 · क्षितिज भाग 2

हिन्दी (गद्य) · CBSE Class 10 · क्षितिज भाग 2 · स्वयं प्रकाश (कहानी) · 25 क्विज़

नेताजी का चश्मा — लेखक परिचय, कहानी का सार, पात्र-परिचय एवं शब्दार्थ

लेखक परिचय

स्वयं प्रकाश (जन्म सन् 1947, इंदौर, म.प्र. — निधन सन् 2019) समकालीन कहानी के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर उन्होंने एक औद्योगिक प्रतिष्ठान में नौकरी की; उनका अधिकांश जीवन राजस्थान में बीता। वे ‘वसुधा’ पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे। प्रमुख कहानी-संग्रह — सूरज कब निकलेगा, आएँगे अच्छे दिन भी, आदमी जात का आदमी, संधान; उपन्यास — बीच में विनय एवं ईंधन। मध्यवर्गीय जीवन के कुशल चितेरे स्वयं प्रकाश की कहानियों में वर्ग-शोषण के विरुद्ध चेतना तथा जाति, संप्रदाय एवं लिंग के भेदभाव के विरुद्ध प्रतिकार का स्वर है। उन्हें पहल सम्मान, बनमाली पुरस्कार आदि मिले।

पाठ-परिचय

केवल चारों ओर सीमाओं से घिरे भूभाग का नाम ही देश नहीं होता; देश बनता है उसमें रहने वाले सभी नागरिकों, नदियों, पहाड़ों, पेड़-पौधों एवं पशु-पक्षियों से। इन सबसे प्रेम करना ही देशभक्ति है। ‘नेताजी का चश्मा’ कहानी कैप्टन चश्मेवाले के माध्यम से देश के उन करोड़ों नागरिकों के योगदान को रेखांकित करती है जो देश के निर्माण में अपने-अपने तरीके से सहयोग करते हैं। कहानी यह भी कहती है कि इसमें केवल बड़े ही नहीं, बच्चे भी शामिल हैं।

कहानी का सार

हालदार साहब को कंपनी के काम से हर पंद्रहवें दिन एक कस्बे से गुज़रना पड़ता था। उस कस्बे के मुख्य चौराहे पर नगरपालिका ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस की संगमरमर की मूर्ति लगवाई थी, जिसे स्थानीय ड्राइंग मास्टर मोतीलाल ने बनाया था। मूर्ति सुंदर थी, फौजी वर्दी में; केवल एक कमी थी — उसकी आँखों पर संगमरमर का नहीं, बल्कि एक असली चश्मा (चौड़ा काला फ्रेम) लगा था।

हर बार गुज़रते समय हालदार साहब देखते कि मूर्ति पर चश्मा बदल जाता है — कभी गोल, कभी चौकोर, कभी काला, कभी धूप का। पूछने पर पानवाले ने बताया कि ‘कैप्टन चश्मेवाला’ ऐसा करता है — वह एक लंगड़ा फेरीवाला है जो चश्मे बेचता है। जब कोई ग्राहक मूर्ति पर लगे फ्रेम जैसा चश्मा माँगता तो वह वह फ्रेम मूर्ति से उतारकर (नेताजी से क्षमा माँगते हुए) ग्राहक को दे देता और बाद में दूसरा फ्रेम लगा देता। नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति उसे आहत करती थी।

दो साल बाद एक दिन मूर्ति पर कोई चश्मा नहीं था और पानवाले ने उदास होकर बताया — ‘कैप्टन मर गया।’ हालदार साहब दुखी हुए, सोचते रहे कि कैसी कौम है जो अपने देशभक्तों पर हँसती है। पंद्रह दिन बाद फिर गुज़रते हुए उन्होंने तय किया कि आज रुकेंगे नहीं। पर आदत से मजबूर आँखें मूर्ति की ओर उठ गईं — और उन्होंने देखा कि मूर्ति की आँखों पर किसी बच्चे ने सरकंडे का छोटा-सा चश्मा बना कर रख दिया है। यह देखकर भावुक हालदार साहब की आँखें भर आईं — क्योंकि इससे पता चला कि देशभक्ति की भावना अभी जीवित है, नई पीढ़ी में भी।

पात्र-परिचय

हालदार साहब — संवेदनशील, देशभक्त एवं भावुक; छोटी-सी बात में निहित देश-भावना को पहचानने वाले। कैप्टन चश्मेवाला — बूढ़ा, लंगड़ा, गरीब फेरीवाला, पर सच्चा देशभक्त; नेताजी के प्रति अगाध श्रद्धा। पानवाला — काला, मोटा, खुशमिज़ाज, व्यंग्यप्रिय; पर भीतर से संवेदनशील। मास्टर मोतीलाल — कस्बे का इकलौता ड्राइंग मास्टर, जिसने मूर्ति बनाई।

शब्दार्थ

कस्बा = छोटा शहर; कौतुक = कुतूहल, आश्चर्य-मिश्रित आनंद; बस्ट = कंधे तक की मूर्ति; दुर्दमनीय = जिसे दबाया न जा सके; कौम = जाति, समुदाय; होम देना = न्योछावर/बलिदान कर देना; नतमस्तक = सिर झुकाना; मरियल = बहुत कमज़ोर; सरकंडा = एक पतली लकड़ी जैसी घास; द्रवित = भावुक होना; फेरी लगाना = घूम-घूमकर सामान बेचना।

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