हिन्दी (गद्य) · CBSE Class 10 · क्षितिज भाग 2 · रामवृक्ष बेनीपुरी (रेखाचित्र) · 25 क्विज़
बालगोबिन भगत — लेखक परिचय, पाठ-सार, पात्र-विशेषताएँ एवं शब्दार्थ
लेखक परिचय
रामवृक्ष बेनीपुरी (जन्म सन् 1899, बेनीपुर, मुजफ्फरपुर, बिहार — निधन सन् 1968) हिन्दी के प्रतिभाशाली पत्रकार एवं गद्य-लेखक थे। माता-पिता का निधन बचपन में ही हो जाने के कारण उनका आरंभिक जीवन अभावों एवं संघर्षों में बीता। सन् 1920 में वे राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े और कई बार जेल भी गए। मात्र 15 वर्ष की अवस्था में उनकी रचनाएँ छपने लगीं। प्रमुख रचनाएँ — पतितों के देश में (उपन्यास), चिता के फूल (कहानी), अंबपाली (नाटक), माटी की मूरतें (रेखाचित्र), पैरों में पंख बाँधकर (यात्रा-वृत्तांत), ज़ंजीरें और दीवारें (संस्मरण)। विशिष्ट शैलीकार होने के कारण उन्हें ‘कलम का जादूगर’ कहा जाता है।
पाठ-परिचय
‘बालगोबिन भगत’ एक रेखाचित्र है जिसमें लेखक ने एक ऐसे विलक्षण चरित्र का उद्घाटन किया है जो मनुष्यता, लोक-संस्कृति एवं सामूहिक चेतना का प्रतीक है। पाठ यह संदेश देता है कि वेशभूषा या बाहरी अनुष्ठानों से कोई संन्यासी नहीं होता — संन्यास का आधार जीवन के मानवीय सरोकार होते हैं। बालगोबिन भगत इसी आधार पर लेखक को साधु लगते हैं। यह पाठ सामाजिक रूढ़ियों पर भी प्रहार करता है और ग्रामीण जीवन की सजीव झाँकी प्रस्तुत करता है।
पाठ का सार
बालगोबिन भगत मँझोले कद के गोरे-चिट्टे, साठ से ऊपर के व्यक्ति थे — कमर में लँगोटी, सिर पर कबीरपंथी कनफटी टोपी, मस्तक पर रामानंदी चंदन एवं गले में तुलसी की माला। वे गृहस्थ होते हुए भी सच्चे साधु थे — कभी झूठ न बोलते, खरा व्यवहार रखते, बिना पूछे किसी की चीज़ न छूते। वे कबीर को ‘साहब’ मानते, उन्हीं के पद गाते एवं आदेश पर चलते। खेत की सारी उपज पहले कबीरपंथी मठ में भेंट कर, ‘प्रसाद’ रूप में जो मिलता उसी से गुज़र करते।
उनके मधुर गायन पर पूरा गाँव मुग्ध था। आषाढ़ में धान की रोपनी के समय कीचड़ में लिथड़े भगत का संगीत पूरे वातावरण को चमत्कृत कर देता — बच्चे झूम उठते, औरतों के होंठ गुनगुनाते, हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते। भादो की अँधेरी रात में, माघ की कड़कड़ाती भोर में नदी-स्नान कर खँजड़ी लेकर प्रभाती गाते; गर्मियों में आँगन में ‘संझा’ गाते, जहाँ सारा आँगन नृत्य एवं संगीत से ओतप्रोत हो उठता।
उनकी संगीत-साधना का चरम उस दिन दिखा जब उनका इकलौता बेटा मरा। बेटे को चटाई पर लिटा, फूल-तुलसी बिखेर, सिरहाने दीपक जलाकर वे शोक के बजाय गीत गाते रहे — पुत्रवधू को रोने के बजाय उत्सव मनाने को कहा, कि आत्मा परमात्मा से जा मिली। श्राद्ध के बाद उन्होंने पुत्रवधू को ज़बरदस्ती उसके भाई के साथ भेजकर दूसरी शादी का आदेश दिया। अंत में, हर वर्ष की तरह गंगा-स्नान से लौटने के बाद वे बीमार पड़े, पर नेम-व्रत (गीत, स्नान-ध्यान) न छोड़े; एक दिन भोर में लोगों ने गीत न सुना — भगत नहीं रहे, केवल उनका पंजर पड़ा था।
शब्दार्थ
मँझोला = न बहुत बड़ा न छोटा; कमली = कंबल; पतोहू = पुत्रवधू; रोपनी = धान की रोपाई; कलेवा = सवेरे का जलपान; पुरवाई = पूरब से बहने वाली हवा; अधरतिया = आधी रात; खँजड़ी = ढपली जैसा छोटा वाद्य यंत्र; निस्तब्धता = सन्नाटा; लोही = प्रातःकाल की लालिमा; कुहासा = कोहरा; आवृत = ढका हुआ; कुश = एक नुकीली घास; बोदा = कम बुद्धि वाला; संबल = सहारा; प्रभाती = प्रातःकाल गाया जाने वाला गीत।
प्रश्न-अभ्यास (सभी उत्तर — प्रश्न-अभ्यास + रचना-अभिव्यक्ति + भाषा-अध्ययन)
1खेतीबारी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण ‘साधु’ कहलाते थे?
बालगोबिन भगत गृहस्थ होते हुए भी इन गुणों के कारण साधु कहलाते थे — (i) वे कभी झूठ नहीं बोलते, खरा व्यवहार रखते; (ii) बिना पूछे किसी की चीज़ नहीं छूते (दूसरे के खेत में शौच तक नहीं बैठते); (iii) कबीर को ‘साहब’ मानते, उन्हीं के आदेश पर चलते; (iv) निर्लोभ — खेत की सारी उपज पहले मठ में भेंट कर, प्रसाद रूप में मिले से ही गुज़र करते; (v) किसी से व्यर्थ झगड़ा न करते। इन्हीं मानवीय एवं सात्त्विक गुणों से वे सच्चे साधु थे।
2भगत की पुत्रवधू उन्हें अकेले क्यों नहीं छोड़ना चाहती थी?
पुत्रवधू भगत से स्नेह एवं उनकी सेवा की चिंता करती थी। वे बूढ़े हो चुके थे; वह सोचती थी कि — ‘मैं चली जाऊँगी तो बुढ़ापे में उनके लिए भोजन कौन बनाएगा, बीमार पड़ने पर एक चुल्लू पानी भी कौन देगा?’ इसी स्नेह एवं सेवा-भावना के कारण वह उन्हें अकेला छोड़कर जाना नहीं चाहती थी।
3भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएँ किस तरह व्यक्त कीं?
भगत ने बेटे की मृत्यु पर शोक के बजाय उत्सव मनाया। उन्होंने बेटे को चटाई पर लिटाकर उस पर फूल एवं तुलसीदल बिखेरे, सिरहाने दीपक जलाया और सामने बैठकर गीत गाते रहे। उन्होंने रोती पुत्रवधू को भी रोने के बजाय उत्सव मनाने को कहा — उनका मानना था कि आत्मा परमात्मा के पास चली गई, विरहिणी अपने प्रेमी से जा मिली; इससे बढ़कर आनंद की क्या बात! यह मृत्यु पर विजयी उनका चरम विश्वास था।
4भगत के व्यक्तित्व और उनकी वेशभूषा का अपने शब्दों में चित्र प्रस्तुत कीजिए।
वेशभूषा: भगत मँझोले कद के गोरे-चिट्टे, साठ से ऊपर के व्यक्ति थे; बाल पक गए थे। वे कमर में एक लँगोटी, सिर पर कबीरपंथी कनफटी टोपी पहनते; जाड़े में काली कमली ओढ़ते, मस्तक पर रामानंदी चंदन लगाते एवं गले में तुलसी की बेडौल माला बाँधे रहते। व्यक्तित्व: वे सरल, सत्यनिष्ठ, निर्लोभ, स्पष्टवक्ता, दृढ़ आस्था वाले एवं संगीत-प्रेमी थे — एक सच्चे साधु।
5बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के अचरज का कारण क्यों थी?
उनकी दिनचर्या अत्यंत कठोर एवं नियमबद्ध थी, जो लोगों को अचरज में डालती — कार्तिक से फागुन तक वे प्रतिदिन भोर में उठते, गाँव से दो मील दूर नदी में स्नान करते, लौटकर पोखरे के ऊँचे भिंडे पर खँजड़ी लेकर प्रभाती गाते। माघ की कड़कड़ाती ठंड में भी यह नियम न छोड़ते; गर्मियों में ‘संझा’ गाते। वृद्धावस्था एवं बीमारी में भी नेम-व्रत न छोड़ना लोगों के लिए विस्मयकारी था।
6पाठ के आधार पर बालगोबिन भगत के मधुर गायन की विशेषताएँ लिखिए।
उनके गायन की विशेषताएँ — (i) वे कबीर के सीधे-सादे पद गाते, जो उनके कंठ से निकलकर सजीव हो उठते; (ii) स्वर इतना मधुर एवं प्रभावशाली होता कि सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते; (iii) रोपनी करने वालों की अँगुलियाँ, हलवाहों के पैर एवं औरतों के होंठ ताल-लय में थिरक उठते; (iv) श्रोताओं का मन तन पर हावी होकर नृत्यशील हो उठता। उनके संगीत में मानो जादू था।
7कुछ मार्मिक प्रसंगों के आधार पर दिखाई देता है कि भगत प्रचलित सामाजिक मान्यताओं को नहीं मानते थे। पाठ के आधार पर उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए।
ऐसे प्रसंग — (i) बेटे की मृत्यु पर रोने के बजाय उत्सव मनाना एवं गीत गाना; (ii) बेटे को मुखाग्नि पुत्रवधू (स्त्री) से दिलवाना, जबकि परंपरा में यह पुरुष करता है; (iii) श्राद्ध के बाद पुत्रवधू को ज़बरदस्ती उसके भाई के साथ भेजकर पुनर्विवाह (विधवा-विवाह) का आदेश देना। ये प्रसंग दर्शाते हैं कि भगत रूढ़ियों से ऊपर, प्रगतिशील एवं मानवीय सोच वाले थे।
8धान की रोपाई के समय समूचे माहौल को भगत की स्वर-लहरियाँ किस तरह चमत्कृत कर देती थीं? उस माहौल का शब्द-चित्र प्रस्तुत कीजिए।
(शब्द-चित्र) आषाढ़ की रिमझिम में समूचा गाँव खेतों में उतर पड़ा है — कहीं हल चल रहे, कहीं रोपनी हो रही; बच्चे पानी-भरे खेतों में उछल रहे, औरतें कलेवा लेकर मेड़ पर बैठी हैं; आकाश बादलों से घिरा, ठंडी पुरवाई बह रही। ऐसे में कीचड़ में लिथड़े भगत रोपनी करते हुए गाते हैं, और उनका मधुर संगीत पूरे वातावरण को चमत्कृत कर देता है — बच्चे झूम उठते, औरतों के होंठ काँपकर गुनगुनाने लगते, हलवाहों के पैर एवं रोपनी करने वालों की अँगुलियाँ ताल से चलने लगती हैं। मानो यह संगीत न होकर जादू हो!
9रचना-अभिव्यक्ति: पाठ के आधार पर बताएँ कि बालगोबिन भगत की कबीर पर श्रद्धा किन-किन रूपों में प्रकट हुई है?
भगत की कबीर पर श्रद्धा इन रूपों में प्रकट हुई — (i) वे कबीर को ‘साहब’ मानते थे; (ii) सदा कबीर के ही पद/गीत गाते; (iii) कबीर के आदेशों पर चलते — सत्य, निर्लोभ एवं खरा व्यवहार; (iv) अपनी सारी उपज पहले कबीरपंथी मठ में भेंट कर, प्रसाद रूप में मिले से गुज़र करते; (v) वेशभूषा (कनफटी टोपी) एवं जीवन-शैली में भी कबीरपंथी आदर्श अपनाते।
10आपकी दृष्टि में भगत की कबीर पर अगाध श्रद्धा के क्या कारण रहे होंगे?
(नमूना) कबीर की सादगी, सत्यनिष्ठा, निर्गुण भक्ति, मानवता एवं रूढ़ि-विरोध भगत के अपने स्वभाव से पूरी तरह मेल खाते थे। भगत स्वयं सरल, सच्चे एवं रूढ़ियों से ऊपर थे; कबीर के विचार उन्हें अपने जीवन-दर्शन के अनुरूप लगे। इसी वैचारिक एवं आत्मिक समानता के कारण उनकी कबीर पर अगाध श्रद्धा थी।
11गाँव का सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश आषाढ़ चढ़ते ही उल्लास से क्यों भर जाता है?
आषाढ़ चढ़ते ही वर्षा आती है और खेती का काम (धान की रोपाई) आरंभ होता है। खेतों में हरियाली एवं पानी भर जाता है, किसानों में अच्छी फसल की आशा एवं नया उत्साह जागता है। पूरा गाँव खेतों में जुट जाता है, बच्चे-औरतें-किसान सब काम एवं उल्लास में डूब जाते हैं — इसीलिए परिवेश उल्लास से भर जाता है।
12रचना-अभिव्यक्ति: ‘ऊपर की तसवीर से यह न माना जाए कि बालगोबिन भगत साधु थे।’ क्या ‘साधु’ की पहचान पहनावे के आधार पर की जानी चाहिए? आप किन आधारों पर यह सुनिश्चित करेंगे कि अमुक व्यक्ति ‘साधु’ है?
नहीं, ‘साधु’ की पहचान केवल पहनावे या बाहरी वेश से नहीं की जानी चाहिए — भगवा वस्त्र या माला पहनने से कोई साधु नहीं हो जाता। साधु की पहचान उसके आचरण एवं गुणों से होनी चाहिए — सत्यनिष्ठा, निर्लोभ, मानवता, सेवा-भाव, संयम एवं निश्छल व्यवहार। बालगोबिन भगत गृहस्थ होकर भी इन्हीं गुणों के कारण सच्चे साधु थे। अतः साधुता वेश में नहीं, चरित्र में होती है।
13मोह और प्रेम में अंतर होता है। भगत के जीवन की किस घटना के आधार पर इस कथन का सत्य सिद्ध करेंगे?
बेटे की मृत्यु की घटना इस कथन को सिद्ध करती है। यदि भगत को बेटे से केवल मोह होता तो वे टूटकर विलाप करते, पर उन्होंने शोक के बजाय उत्सव मनाया — क्योंकि उन्हें बेटे से सच्चा प्रेम एवं आत्मा-परमात्मा मिलन का बोध था। मोह बंधन एवं स्वार्थ है, जबकि प्रेम मुक्ति एवं निःस्वार्थता। भगत का व्यवहार दर्शाता है कि उनके भीतर मोह नहीं, निर्मल प्रेम था।
14भाषा-अध्ययन: इस पाठ में आए कोई दस क्रियाविशेषण छाँटकर लिखिए और उनके भेद भी बताइए।
क्रियाविशेषण एवं उनके भेद — धीरे-धीरे (रीतिवाचक), बार-बार (रीतिवाचक), हमेशा (कालवाचक), कभी-कभी (कालवाचक), अचानक (कालवाचक), लगातार (रीतिवाचक), थोड़ा (परिमाणवाचक), देर तक (कालवाचक), जल्दी (कालवाचक), ज़रूर (रीतिवाचक/निश्चयवाचक)। (पाठ में से चुने गए; छात्र अपने उदाहरण भी जोड़ सकते हैं।)