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क्षितिज पाठ 8: बालगोबिन भगत

गद्य खंड · पाठ 8 · क्षितिज भाग 2

हिन्दी (गद्य) · CBSE Class 10 · क्षितिज भाग 2 · रामवृक्ष बेनीपुरी (रेखाचित्र) · 25 क्विज़

बालगोबिन भगत — लेखक परिचय, पाठ-सार, पात्र-विशेषताएँ एवं शब्दार्थ

लेखक परिचय

रामवृक्ष बेनीपुरी (जन्म सन् 1899, बेनीपुर, मुजफ्फरपुर, बिहार — निधन सन् 1968) हिन्दी के प्रतिभाशाली पत्रकार एवं गद्य-लेखक थे। माता-पिता का निधन बचपन में ही हो जाने के कारण उनका आरंभिक जीवन अभावों एवं संघर्षों में बीता। सन् 1920 में वे राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े और कई बार जेल भी गए। मात्र 15 वर्ष की अवस्था में उनकी रचनाएँ छपने लगीं। प्रमुख रचनाएँ — पतितों के देश में (उपन्यास), चिता के फूल (कहानी), अंबपाली (नाटक), माटी की मूरतें (रेखाचित्र), पैरों में पंख बाँधकर (यात्रा-वृत्तांत), ज़ंजीरें और दीवारें (संस्मरण)। विशिष्ट शैलीकार होने के कारण उन्हें ‘कलम का जादूगर’ कहा जाता है।

पाठ-परिचय

‘बालगोबिन भगत’ एक रेखाचित्र है जिसमें लेखक ने एक ऐसे विलक्षण चरित्र का उद्घाटन किया है जो मनुष्यता, लोक-संस्कृति एवं सामूहिक चेतना का प्रतीक है। पाठ यह संदेश देता है कि वेशभूषा या बाहरी अनुष्ठानों से कोई संन्यासी नहीं होता — संन्यास का आधार जीवन के मानवीय सरोकार होते हैं। बालगोबिन भगत इसी आधार पर लेखक को साधु लगते हैं। यह पाठ सामाजिक रूढ़ियों पर भी प्रहार करता है और ग्रामीण जीवन की सजीव झाँकी प्रस्तुत करता है।

पाठ का सार

बालगोबिन भगत मँझोले कद के गोरे-चिट्टे, साठ से ऊपर के व्यक्ति थे — कमर में लँगोटी, सिर पर कबीरपंथी कनफटी टोपी, मस्तक पर रामानंदी चंदन एवं गले में तुलसी की माला। वे गृहस्थ होते हुए भी सच्चे साधु थे — कभी झूठ न बोलते, खरा व्यवहार रखते, बिना पूछे किसी की चीज़ न छूते। वे कबीर को ‘साहब’ मानते, उन्हीं के पद गाते एवं आदेश पर चलते। खेत की सारी उपज पहले कबीरपंथी मठ में भेंट कर, ‘प्रसाद’ रूप में जो मिलता उसी से गुज़र करते।

उनके मधुर गायन पर पूरा गाँव मुग्ध था। आषाढ़ में धान की रोपनी के समय कीचड़ में लिथड़े भगत का संगीत पूरे वातावरण को चमत्कृत कर देता — बच्चे झूम उठते, औरतों के होंठ गुनगुनाते, हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते। भादो की अँधेरी रात में, माघ की कड़कड़ाती भोर में नदी-स्नान कर खँजड़ी लेकर प्रभाती गाते; गर्मियों में आँगन में ‘संझा’ गाते, जहाँ सारा आँगन नृत्य एवं संगीत से ओतप्रोत हो उठता।

उनकी संगीत-साधना का चरम उस दिन दिखा जब उनका इकलौता बेटा मरा। बेटे को चटाई पर लिटा, फूल-तुलसी बिखेर, सिरहाने दीपक जलाकर वे शोक के बजाय गीत गाते रहे — पुत्रवधू को रोने के बजाय उत्सव मनाने को कहा, कि आत्मा परमात्मा से जा मिली। श्राद्ध के बाद उन्होंने पुत्रवधू को ज़बरदस्ती उसके भाई के साथ भेजकर दूसरी शादी का आदेश दिया। अंत में, हर वर्ष की तरह गंगा-स्नान से लौटने के बाद वे बीमार पड़े, पर नेम-व्रत (गीत, स्नान-ध्यान) न छोड़े; एक दिन भोर में लोगों ने गीत न सुना — भगत नहीं रहे, केवल उनका पंजर पड़ा था।

शब्दार्थ

मँझोला = न बहुत बड़ा न छोटा; कमली = कंबल; पतोहू = पुत्रवधू; रोपनी = धान की रोपाई; कलेवा = सवेरे का जलपान; पुरवाई = पूरब से बहने वाली हवा; अधरतिया = आधी रात; खँजड़ी = ढपली जैसा छोटा वाद्य यंत्र; निस्तब्धता = सन्नाटा; लोही = प्रातःकाल की लालिमा; कुहासा = कोहरा; आवृत = ढका हुआ; कुश = एक नुकीली घास; बोदा = कम बुद्धि वाला; संबल = सहारा; प्रभाती = प्रातःकाल गाया जाने वाला गीत।

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