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क्षितिज पाठ 9: लखनवी अंदाज़

गद्य खंड · पाठ 9 · क्षितिज भाग 2

हिन्दी (गद्य) · CBSE Class 10 · क्षितिज भाग 2 · यशपाल (व्यंग्य) · 25 क्विज़

लखनवी अंदाज़ — लेखक परिचय, पाठ-सार, व्यंग्य-भाव एवं शब्दार्थ

लेखक परिचय

यशपाल (जन्म सन् 1903, फ़िरोज़पुर छावनी, पंजाब — निधन सन् 1976) यथार्थवादी शैली के विशिष्ट रचनाकार थे। लाहौर के नेशनल कॉलेज से बी.ए. करते समय उनका परिचय भगत सिंह एवं सुखदेव से हुआ; स्वाधीनता संग्राम की क्रांतिकारी धारा से जुड़ाव के कारण वे जेल भी गए। उनकी रचनाओं में आम आदमी के सरोकार तथा सामाजिक विषमता, राजनैतिक पाखंड एवं रूढ़ियों के विरुद्ध मुखर स्वर मिलता है। प्रमुख कहानी-संग्रह — ज्ञानदान, तर्क का तूफ़ान, पिंजरे की उड़ान, फूलो का कुर्ता; उपन्यास — झूठा सच (भारत-विभाजन की त्रासदी का मार्मिक दस्तावेज़), दिव्या, अमिता आदि। भाषा की स्वाभाविकता एवं सजीवता उनकी रचनागत विशेषता है।

पाठ-परिचय

यशपाल ने ‘लखनवी अंदाज़’ व्यंग्य यह सिद्ध करने के लिए लिखा था कि बिना कथ्य (विचार, घटना, पात्र) के कहानी नहीं लिखी जा सकती। परंतु इसे एक स्वतंत्र रचना के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। इसमें यशपाल उस पतनशील सामंती वर्ग पर कटाक्ष करते हैं जो वास्तविकता से बेख़बर होकर एक बनावटी एवं दिखावटी जीवन-शैली का आदी है। लेखक दिखाते हैं कि ऐसी परजीवी एवं आडंबरी संस्कृति आज भी देखी जा सकती है।

पाठ का सार

लेखक नयी कहानी के बारे में सोचने एवं प्राकृतिक दृश्य देखने के लिए, भीड़ से बचकर, सेकंड क्लास का टिकट लेकर एक छोटे-से डिब्बे में चढ़ जाते हैं। डिब्बे में पहले से ही लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सफेदपोश सज्जन पालथी मारे बैठे थे; सामने तौलिये पर दो ताज़े-चिकने खीरे रखे थे। लेखक के अचानक कूद पड़ने पर नवाब साहब की आँखों में एकांत-चिंतन में विघ्न का असंतोष झलका; उन्होंने संगति के लिए कोई उत्साह न दिखाया।

कुछ देर बाद नवाब साहब ने लेखक को खीरे का शौक फ़रमाने का निमंत्रण दिया, पर लेखक ने आत्मसम्मान रखते हुए मना कर दिया। फिर नवाब साहब ने बड़ी नफ़ासत से तौलिया बिछाया, खीरे धोए-पोंछे, चाकू से छीलकर फाँकें करीने से सजाईं, जीरा-मिला नमक एवं लाल मिर्च बुरकी — ऐसा जताते हुए मानो अब स्वाद लेंगे। पर अंत में उन्होंने एक-एक फाँक केवल होंठों तक ले जाकर, सूँघकर खिड़की से बाहर फेंक दी! अंत में तौलिये से हाथ-होंठ पोंछकर, गर्व से लेखक की ओर देखा — मानो कह रहे हों, ‘यह है खानदानी रईसों का तरीका!’ और भरे पेट की डकार लेकर बोले कि ‘खीरा नामुराद मेदे (आमाशय) पर बोझ डाल देता है।’

यह देख लेखक के ज्ञान-चक्षु खुल गए — उन्होंने पहचान लिया कि ये तो ‘नयी कहानी’ के लेखक हैं! जैसे खीरे की सुगंध-स्वाद की कल्पना मात्र से डकार आ सकती है, वैसे ही बिना विचार, घटना एवं पात्रों के, केवल लेखक की इच्छा से ‘नयी कहानी’ क्यों नहीं बन सकती? — यही व्यंग्य इस रचना का मर्म है।

शब्दार्थ

मुफ़स्सिल = केंद्रीय नगर के इर्द-गिर्द के स्थान; सफेदपोश = भद्र व्यक्ति; किफ़ायत = मितव्ययिता; आदाब-अर्ज़ = अभिवादन का एक ढंग; गुमान = भ्रम; एहतियात = सावधानी; बुरक देना = छिड़क देना; स्फुरण = फड़कना; प्लावित = पानी भर जाना; पनियाती = रसीली; मेदा = आमाशय; तसलीम = सम्मान में; सिर ख़म करना = सिर झुकाना; तहज़ीब = शिष्टता; नफ़ासत = स्वच्छता/सुरुचि; नज़ाकत = कोमलता; नफ़ीस = बढ़िया; एब्स्ट्रैक्ट = सूक्ष्म/अमूर्त; सकील = आसानी से न पचने वाला।

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