हिन्दी (गद्य) · CBSE Class 9 · गंगा · पाठ 5: आखिरी चट्टान तक (मोहन राकेश) · 25 क्विज़
पाठ 5 — आखिरी चट्टान तक (लेखक परिचय, सार, शब्दार्थ)
यह ‘गंगा’ (कक्षा 9) के गद्य खंड की पाँचवीं रचना है — मोहन राकेश का एक रोचक यात्रा-वृत्तांत, जिसमें लेखक ने कन्याकुमारी की यात्रा के अनुभव सजीव व चित्रात्मक ढंग से व्यक्त किए हैं।
लेखक परिचय — मोहन राकेश
जन्म सन् 1925, अमृतसर (पंजाब)। कहानी, उपन्यास, नाटक, डायरी व यात्रा-वृत्तांत — अनेक विधाओं में लेखन। प्रमुख रचनाएँ — आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, आधे-अधूरे (नाटक), अँधेरे बंद कमरे, न आने वाला कल (उपन्यास), आखिरी चट्टान तक (यात्रा-वृत्तांत)। ‘आषाढ़ का एक दिन’ के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार। ‘सारिका’ पत्रिका का संपादन। निधन सन् 1972 (मात्र 48 वर्ष की आयु में)।
पाठ-सार
लेखक कन्याकुमारी में उस स्थान पर खड़े हैं जहाँ अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी मिलते हैं। समुद्र के बीच उभरी उस विवेकानंद चट्टान को, जहाँ स्वामी विवेकानंद ने समाधि लगाई थी, वे देर तक निहारते हैं; चारों ओर जल का अपार विस्तार देखकर वे अनुभव करते हैं — ‘शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति’। बढ़ते पानी में अपनी छोटी चट्टान घिरती देख वे किनारे लौट आते हैं।
फिर वे सूर्यास्त देखने ‘सैंड हिल’ की ओर चलते हैं, पर खुला दृश्य पाने के लिए एक के बाद एक कई रेत के टीले पार करते जाते हैं — ‘टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीीं था’। अंततः एक टीले से खुला पश्चिमी विस्तार दिखता है और वे विजय-भाव से संतुष्ट होकर बैठ जाते हैं। डूबते सूरज के साथ पानी पर रंग बदलते हैं — सोना → लहू → बैंगनी → काला। लौटते समय अँधेरे में भटकने का डर लगता है; वे समुद्र-तट के रास्ते लौटते हैं, जहाँ रेत के अनगिनत अनाम रंग देखकर मुग्ध हो जाते हैं। बढ़ते पानी व ऊँची लहरों से बचते-दौड़ते, एक चट्टान पार कर वे सुरक्षित तट पर पहुँचते हैं।
अगली सुबह वे मल्लाहों की छोटी नाव से विवेकानंद चट्टान पर जाते हैं और सूर्योदय देखते हैं। एक ग्रेजुएट नवयुवक उन्हें बताता है कि कन्याकुमारी में सैकड़ों शिक्षित युवक बेरोज़गार हैं — “हम सीपियों का गूदा खाते हैं और दार्शनिक सिद्धांतों पर बहस करते हैं।” वृत्तांत मंदिर की घंटियों, अघ्र्य देते लोगों, बैरों की कॉफी और लेखक के मन में दोहराए जाते बसों के टाइम-टेबल के साथ समाप्त होता है।
मूल भाव: यह केवल स्थान-वर्णन नहीं, बल्कि प्रकृति की भव्यता और मानव-मन की गहन अनुभूतियों (विस्मय, रोमांच, भय, क्षणभंगुरता, आत्म-चेतना) का समन्वय है। साथ ही बेरोज़गारी जैसे सामाजिक यथार्थ की झलक भी है। भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण व चित्रात्मक है।
विधा — यात्रा-वृत्तांत
यात्रा-वृत्तांत में लेखक अपनी यात्रा के स्थानों, दृश्यों, लोगों और अपने मन के भावों का वर्णन करता है — इसमें दृश्य-वर्णन, आत्मानुभूति, सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य व जीवन-दर्शन का मेल होता है।
शब्द-संपदा (शब्दार्थ)
स्याह = काला; समाधिस्थ = समाधि में स्थित; क्षितिज = जहाँ धरती-आकाश मिलते दिखें; सिहरन = कंपन; पृष्ठभूमि = पीछे का दृश्य; झुरमुट = पास-पास उगे पेड़ों का समूह; बीहड़ = ऊबड़-खाबड़, विकट; मद्धिम = मध्यम, धीमा; सीपी = शंख-जाति का जलचर; दार्शनिक = दर्शनशास्त्र का ज्ञाता; ओट = आड़; अघ्र्य = पूजा में अर्पित जल; सैंड हिल = बालू का टीला; सुरमई = हल्का नीला; सिर धुनना = पछताना/मातम करना; बे-लाग = निरपेक्ष, दो-टूक।
अभ्यास — सभी प्रश्न-उत्तर
‘आखिरी चट्टान तक’ (यात्रा-वृत्तांत) के ‘मेरे उत्तर मेरे तर्क’, ‘मेरी समझ मेरे विचार’, यात्रा-वृत्तांत के तत्व एवं व्याकरण (क्रिया-विशेषण, नए वाक्य) के पूर्ण उत्तर।
1मेरे उत्तर मेरे तर्क — लेखक ने सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य कहाँ से देखा?
(ख) अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले से। सैंड हिल से खुला दृश्य न दिखने पर लेखक आगे बढ़ते हुए एक के बाद एक ऊँचे टीले पार करता है और अंततः अरब सागर की ओर के एक ऊँचे टीले से खुला सूर्यास्त देखता है।
2“मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं ही हूँ।” यह किस मनःस्थिति को दर्शाता है?
(ख) विस्मित हो जाना। समुद्र के अपार विस्तार में लेखक इतना खो/मुग्ध हो जाता है कि कुछ क्षण के लिए अपना अस्तित्व ही भूल जाता है — यह विस्मय की स्थिति है।
3“मैंने, सिर्फ मैंने उस चोटी को पहली बार सर किया हो।” इसमें कौन-सा भाव है?
(घ) संतुष्टि। कई टीले पार कर खुला विस्तार पा लेने पर लेखक को अपने प्रयत्न की सफलता का गर्व-मिश्रित संतोष होता है।
4“शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति” वाक्य में वर्णन है —
(ख) सागर की व्यापकता का। तीनों ओर क्षितिज तक फैले अपार जल और उसकी अपार शक्ति का अनुभव इस पंक्ति में व्यक्त हुआ है।
5लेखक की कन्याकुमारी-यात्रा के वर्णन के बारे में सही कथन है —
(ख) यह यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ता है। वृत्तांत केवल स्थान-वर्णन नहीं, बल्कि प्रकृति-सौंदर्य को लेखक के विस्मय, भय, रोमांच व आत्म-चेतना जैसी जीवंत अनुभूतियों से जोड़ देता है।
MSमेरी समझ मेरे विचार
1. सैंड हिल से अरब सागर की ओर का दृश्य एक और ऊँचा टीला ओट में लिए था; लेखक पूरा खुला पश्चिमी विस्तार और उसकी पृष्ठभूमि में सूर्यास्त देखना चाहता था, इसलिए वह एक के बाद एक टीले पार करता गया। 2. स्थानीय लोग — सैकड़ों शिक्षित पर बेरोज़गार नवयुवक (कई ग्रेजुएट), जो फोटो-एल्बम बेचने जैसे छोटे काम करते, नौकरी की अर्ज़ियाँ देते और बहस करते हैं (“सीपियों का गूदा खाते और दार्शनिक सिद्धांतों पर बहस करते हैं”); शंख-मालाएँ बेचती युवतियाँ; नाव चलाने वाले मल्लाह। 3. ‘प्रयत्न की सार्थकता’ = कई टीले पार करने के थका देने वाले प्रयास का सफल होना — अंततः एक टीले से खुला पश्चिमी विस्तार व सूर्यास्त दिख जाना; उसका परिश्रम व्यर्थ नहीं गया। 4. नए अनुभव — तीन सागरों का संगम, विवेकानंद चट्टान, डूबते सूरज के साथ पानी पर बदलते रंग (सोना→लहू→बैंगनी→काला), और तट की रेत के अनगिनत अनाम रंग। 5. मानसिक दृढ़ता के अंश — (i) ‘टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीीं था’; (ii) ‘हर अगले टीले पर…लगता कि शायद अब एक ही टीला और है’ — और वह बढ़ता ही गया।
YVयात्रा-वृत्तांत के तत्व (पाठ के उदाहरण सहित)
दृश्य-वर्णन: समुद्र, स्याह चट्टानें, बदलते रंग, रेत का जीवंत चित्रण। आत्मानुभूति/भाव: विस्मय, रोमांच, भय, क्षणभंगुरता की उदासी, अपने अस्तित्व का बोध। सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य: विवेकानंद चट्टान, स्थानीय नवयुवक व बेरोज़गारी, मंदिर-घंटियाँ व अघ्र्य। जीवन-दर्शन: ‘शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति’, आत्म-चेतना, क्षणभंगुरता। रोमांच व संघर्ष: लहरों से बचकर दौड़ना, अँधेरे में भटकने का भय, सुरक्षित लौटने की चिंता। शैली: सजीव, प्रवाहपूर्ण, चित्रात्मक भाषा; रूपक, उपमा व रंगों का भावात्मक प्रयोग।
VY1व्याकरण — क्रिया-विशेषण की पहचान
(क) ‘बल खाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं।’ → क्रिया-विशेषण ‘कटती हुई’ (रीतिवाचक) — ‘आती थीं’ क्रिया की विशेषता। (ख) ‘यात्रियों की कितनी ही टोलियाँ उस दिशा में जा रही थीं।’ → ‘उस दिशा में’ (स्थानवाचक) — ‘जा रही थीं’ क्रिया की विशेषता। (ग) ‘मैं देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा।’ → ‘देर तक’ (कालवाचक) — ‘देखता रहा’ क्रिया की विशेषता।
VY2आओ नए वाक्य बनाएँ — रेखांकित शब्दों के अर्थ
पानी-पानी = चारों ओर केवल पानी ही पानी; दूर-दूर = काफी फ़ासले पर बिखरे हुए; दूर तक = बहुत आगे तक; साथ-साथ = एक के साथ लगे हुए/समानांतर; रूखी, बीहड़, वीरान = सूखी-कठोर, ऊबड़-खाबड़ व सुनसान। (इन शब्दों से अपने नए वाक्य बनाइए — जैसे: ‘सड़क के साथ-साथ पेड़ लगे थे।’)