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पाठ 6: रीढ़ की हड्डी

गद्य खंड · पाठ 6 · गंगा

हिन्दी (गद्य) · CBSE Class 9 · गंगा · पाठ 6: रीढ़ की हड्डी (जगदीशचंद्र माथुर) · 25 क्विज़

पाठ 6 — रीढ़ की हड्डी (लेखक परिचय, सार, शब्दार्थ)

यह ‘गंगा’ (कक्षा 9) के गद्य खंड की छठी रचना है — जगदीशचंद्र माथुर का एक प्रसिद्ध एकांकी (रचना-काल 1939), जो दहेज-प्रथा, परंपरागत विवाह-व्यवस्था और स्त्री-शिक्षा को लेकर समाज की रूढ़िगत सोच पर करारा व्यंग्य करता है।

लेखक परिचय — जगदीशचंद्र माथुर

जन्म सन् 1917, शाहजहाँपुर (उ.प्र.); शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से; आई.सी.एस. में चयन व अनेक प्रशासनिक पदों (आकाशवाणी के महानिदेशक आदि) पर कार्य। हिन्दी नाटक व रंगमंच के विकास में उनके एकांकी-नाटकों की बड़ी भूमिका रही। प्रमुख कृतियाँ — कोणार्क (सर्वाधिक चर्चित नाटक), भोर का तारा, ओ मेरे सपने, पहला राजा, दस तस्वीरें। निधन सन् 1978।

पाठ-सार

एकांकी एक घर में घटित होती है जहाँ रामस्वरूप और उनकी पत्नी प्रेमा अपनी पढ़ी-लिखी बेटी उमा का विवाह तय करने के लिए लड़के वालों के स्वागत की तैयारी में जुटे हैं (बीच-बीच में नौकर रतन और ‘मक्खन’ का हास्य चलता रहता है)। लड़के का पिता गोपालप्रसाद और लड़का शंकर आते हैं। गोपालप्रसाद खुद वकील व शिक्षित होते हुए भी चाहते हैं कि बहू ज़्यादा पढ़ी-लिखी न हो (‘मेम साहब’ नहीं चाहिए), और लड़की को वस्तु की तरह ‘नाप-तोल’ कर परखते हैं — गाना, पेंटिंग, सिलाई, इनाम आदि पूछते हैं।

रामस्वरूप ने लड़के वालों से उमा के बारे में झूठ (‘सिर्फ मैट्रिक पढ़ी है’) कहा था। जब उमा का चश्मा दिखता है और उसकी शिक्षा का सच खुलने लगता है, तो उमा स्वयं मुखर होकर इस अपमानजनक प्रथा पर प्रहार करती है — “जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार खरीदार को दिखा देता है…क्या लड़कियाँ बेबस भेड़-बकरियाँ हैं?” वह बताती है कि वह बी.ए. पास है और शंकर पिछली फरवरी में लड़कियों के होस्टल के चक्कर काटते पकड़ा गया था। गोपालप्रसाद क्रोध में चले जाते हैं, और उमा का अंतिम व्यंग्य गूँजता है — “घर जाकर पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी (बैकबोन) भी है या नहीं!” रामस्वरूप धम से बैठ जाते हैं, उमा सिसक पड़ती है — तभी रतन आता है: “बाबूजी, मक्खन!” और परदा गिरता है।

मूल भाव: एकांकी स्त्री-शिक्षा के विरोध, दिखावे, और विवाह में लड़की को वस्तु समझने की सामाजिक कुरीतियों पर व्यंग्य है। ‘रीढ़ की हड्डी’ आत्म-सम्मान व नैतिक दृढ़ता का प्रतीक है — जो उमा में है पर शंकर में नहीं। उमा शिक्षित, सशक्त व स्वाभिमानी नारी का प्रतिनिधित्व करती है।

पात्र

उमा — पढ़ी-लिखी, स्वाभिमानी, निर्भीक लड़की; रामस्वरूप — आधुनिकता का दिखावा पर भीतर से रूढ़िवादी पिता; प्रेमा — पारंपरिक सोच वाली माँ; गोपालप्रसाद — चालाक, दिखावटी, स्त्री-शिक्षा-विरोधी; शंकर — दब्बू, कायर, झुकी कमर वाला लड़का; रतन — हास्य उत्पन्न करने वाला नौकर।

विधा — एकांकी

एकांकी एक अंक वाला नाटक है जिसमें एक ही कथानक, सीमित पात्र व एक समस्या होती है; इसमें रंग-निर्देश (मंच-निर्देश), संवाद व संवाद-निर्देश होते हैं।

शब्द-संपदा (शब्दार्थ)

अधेड़ = ढलती उम्र का; तख्त = लकड़ी की बड़ी चौकी; गुंदमी = गेहुँए रंग का; जंजाल = झंझट; ठठोली = हँसी-परिहास; दकियानूसी = पुराने विचार का; तालीम = शिक्षा; चौपट = नष्ट; दस्तक = खटखटाना; फितरती = चालबाज; खीस निपोरना = बेढंगी हँसी हँसना; तशरीफ़ = आदर/पधारना; तकल्लुफ़ = बनावटी शिष्टाचार; माफ़िक = अनुसार; मुखातिब = संबोधित; निहायत = अत्यंत; जायचा = जन्मपत्री; अधीर = उतावला।

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