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गद्य पाठ 3: देशप्रेमी संन्यासी

गद्य विभाग · पाठ 3 · हिन्दी सौरभ

हिन्दी (गद्य) · Odisha Board Class 10 · संकलित (स्वामी विवेकानन्द) · 25 क्विज़

देशप्रेमी संन्यासी — पाठ-परिचय, विषय-वस्तु, सार एवं शब्दार्थ

पाठ-परिचय (संकलित)

यह पाठ संकलित है — किसी एक लेखक की मूल रचना नहीं, बल्कि विभिन्न स्रोतों से संकलित एक जीवनी-परक निबंध है। इसमें भारत माता के विरल सुपुत्र स्वामी विवेकानन्द के देशप्रेम, त्याग और सेवा-भावना का परिचय दिया गया है। यह बताता है कि किस प्रकार एक संन्यासी होकर भी उन्होंने देश और देशवासियों के उत्थान के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया और विदेशों में भारतीय दर्शन, वेद-वेदांत की महत्ता सिद्ध की।

स्वामी विवेकानन्द — व्यक्तित्व परिचय

स्वामी विवेकानन्द देखने में बहुत सुन्दर, बड़े ज्ञानी और पंडित थे। स्वभाव से सरल, विनयी और मिष्टभाषी, किन्तु प्रचण्ड प्रतिभाशाली थे। वे रामकृष्ण परमहंस के उपयुक्त (योग्य) शिष्य थे। उन्होंने अपनी प्रचंड प्रतिभा, गंभीर ज्ञान और असाधारण वाक्-शक्ति द्वारा विदेशों में भारतीय दर्शन, वेद-वेदांत का महत्त्व प्रमाणित किया। उन्हीं के नाम से रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई, जिसकी अनेक संस्थाएँ आज भी देश-विदेश में जनता की सेवा में लगी हैं।

पाठ का सार

संसार में कुछ लोग धन कमाने में जुटे रहते हैं, कुछ सुख भोगने को व्याकुल रहते हैं; पर कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें संन्यासी कहते हैं — वे अपनी इच्छा से घरबार छोड़ देते हैं, सुख के साधनों का त्याग कर देते हैं, गरीबी में जीते हैं और संसार को माया का जंजाल समझते हैं। आश्चर्य यह है कि ऐसे त्यागी लोगों में से कुछ अपनी मातृभूमि से बेहद प्यार करते हैं। ऐसे ही एक संन्यासी थे स्वामी विवेकानन्द।

सालों पहले की बात है — भारत पराधीन था, यहाँ अंग्रेजों का शासन था। सन् 1857 में लोग एक बार प्रयास करके पराजित हो चुके थे और निराशा, आलस्य तथा कर्महीनता में डूबे हुए थे। ऐसे समय स्वामीजी ने अपने देशवासियों को ललकारा — ‘मेरे प्यारे देशवासियों! उठो, जागो। जीवन का वरदान स्वतंत्रता है, उसे प्राप्त करो। गर्व से कहो कि मैं भारतीय हूँ। हर भारतीय मेरा भाई है। भारत मेरा जीवन है, मेरा प्राण है...।’

एक बार स्वामीजी अमेरिका गए, जहाँ बड़ी धर्मसभा हो रही थी। वहाँ उन्होंने बड़ी मर्मस्पर्शी वाणी में भारत के धर्म, आचार-विचार, ऋषि-मुनियों के चिंतन और आध्यात्मिक दृष्टिकोण का महत्त्व प्रतिपादित किया। अपने सुंदर, सरल और अर्थपूर्ण अंग्रेजी भाषण द्वारा उन्होंने सबके दिलों को अभिभूत कर दिया। फिर वे लगभग एक साल इंग्लैण्ड में रहे और वहाँ के विद्वानों को अपनी विद्वत्ता से प्रभावित किया; वे भी मान गए कि भारत में गरीबी भले ही हो, पर वह ऊँचे विचारों और चिंतन का धनी तथा अगुवा है।

स्वामीजी ने अपने असंख्य अनुयायियों को मानव-सेवा, ज्ञान तथा धर्म-प्रचार में लगाया। देश-विदेश में भारत के नाम को रोशन करनेवाला उनके जैसा दूसरा कोई नहीं दिखाई देता। देश को आजाद करने और उसे सदा जाग्रत रखने में ऐसे देशप्रेमी संन्यासियों का बड़ा योगदान रहा।

शब्दार्थ और टिप्पणी

मिष्टभाषी = मधुरभाषी, मीठा बोलनेवाला। जंजाल = झंझट, बखेड़ा। बैकुण्ठ = स्वर्ग। भरणपोषण = अन्न-वस्त्र देना, पालन करना। अभिभूत = मोहित, द्रवित। संन्यासी = गृह त्यागी साधु। पराधीन = परतंत्र, गुलाम। ललकारना = उत्साहपूर्वक पुकारना/चुनौती देना। वरदान = ईश्वर का दिया श्रेष्ठ दान। हिण्डोला = झूला। सिरमौर = सबसे श्रेष्ठ, शिरोमणि। प्रतिपादित करना = सिद्ध करना, स्थापित करना। मर्मस्पर्शी = हृदय को छू लेनेवाली। अगुवा = नेता, आगे चलनेवाला। विरल = दुर्लभ, कम मिलनेवाला। नमस्य = नमस्कार के योग्य, पूज्य।

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