देशप्रेमी संन्यासी — पाठ-परिचय, विषय-वस्तु, सार एवं शब्दार्थ
पाठ-परिचय (संकलित)
यह पाठ संकलित है — किसी एक लेखक की मूल रचना नहीं, बल्कि विभिन्न स्रोतों से संकलित एक जीवनी-परक निबंध है। इसमें भारत माता के विरल सुपुत्र स्वामी विवेकानन्द के देशप्रेम, त्याग और सेवा-भावना का परिचय दिया गया है। यह बताता है कि किस प्रकार एक संन्यासी होकर भी उन्होंने देश और देशवासियों के उत्थान के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया और विदेशों में भारतीय दर्शन, वेद-वेदांत की महत्ता सिद्ध की।
स्वामी विवेकानन्द — व्यक्तित्व परिचय
स्वामी विवेकानन्द देखने में बहुत सुन्दर, बड़े ज्ञानी और पंडित थे। स्वभाव से सरल, विनयी और मिष्टभाषी, किन्तु प्रचण्ड प्रतिभाशाली थे। वे रामकृष्ण परमहंस के उपयुक्त (योग्य) शिष्य थे। उन्होंने अपनी प्रचंड प्रतिभा, गंभीर ज्ञान और असाधारण वाक्-शक्ति द्वारा विदेशों में भारतीय दर्शन, वेद-वेदांत का महत्त्व प्रमाणित किया। उन्हीं के नाम से रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई, जिसकी अनेक संस्थाएँ आज भी देश-विदेश में जनता की सेवा में लगी हैं।
पाठ का सार
संसार में कुछ लोग धन कमाने में जुटे रहते हैं, कुछ सुख भोगने को व्याकुल रहते हैं; पर कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें संन्यासी कहते हैं — वे अपनी इच्छा से घरबार छोड़ देते हैं, सुख के साधनों का त्याग कर देते हैं, गरीबी में जीते हैं और संसार को माया का जंजाल समझते हैं। आश्चर्य यह है कि ऐसे त्यागी लोगों में से कुछ अपनी मातृभूमि से बेहद प्यार करते हैं। ऐसे ही एक संन्यासी थे स्वामी विवेकानन्द।
सालों पहले की बात है — भारत पराधीन था, यहाँ अंग्रेजों का शासन था। सन् 1857 में लोग एक बार प्रयास करके पराजित हो चुके थे और निराशा, आलस्य तथा कर्महीनता में डूबे हुए थे। ऐसे समय स्वामीजी ने अपने देशवासियों को ललकारा — ‘मेरे प्यारे देशवासियों! उठो, जागो। जीवन का वरदान स्वतंत्रता है, उसे प्राप्त करो। गर्व से कहो कि मैं भारतीय हूँ। हर भारतीय मेरा भाई है। भारत मेरा जीवन है, मेरा प्राण है...।’
एक बार स्वामीजी अमेरिका गए, जहाँ बड़ी धर्मसभा हो रही थी। वहाँ उन्होंने बड़ी मर्मस्पर्शी वाणी में भारत के धर्म, आचार-विचार, ऋषि-मुनियों के चिंतन और आध्यात्मिक दृष्टिकोण का महत्त्व प्रतिपादित किया। अपने सुंदर, सरल और अर्थपूर्ण अंग्रेजी भाषण द्वारा उन्होंने सबके दिलों को अभिभूत कर दिया। फिर वे लगभग एक साल इंग्लैण्ड में रहे और वहाँ के विद्वानों को अपनी विद्वत्ता से प्रभावित किया; वे भी मान गए कि भारत में गरीबी भले ही हो, पर वह ऊँचे विचारों और चिंतन का धनी तथा अगुवा है।
स्वामीजी ने अपने असंख्य अनुयायियों को मानव-सेवा, ज्ञान तथा धर्म-प्रचार में लगाया। देश-विदेश में भारत के नाम को रोशन करनेवाला उनके जैसा दूसरा कोई नहीं दिखाई देता। देश को आजाद करने और उसे सदा जाग्रत रखने में ऐसे देशप्रेमी संन्यासियों का बड़ा योगदान रहा।
शब्दार्थ और टिप्पणी
मिष्टभाषी = मधुरभाषी, मीठा बोलनेवाला। जंजाल = झंझट, बखेड़ा। बैकुण्ठ = स्वर्ग। भरणपोषण = अन्न-वस्त्र देना, पालन करना। अभिभूत = मोहित, द्रवित। संन्यासी = गृह त्यागी साधु। पराधीन = परतंत्र, गुलाम। ललकारना = उत्साहपूर्वक पुकारना/चुनौती देना। वरदान = ईश्वर का दिया श्रेष्ठ दान। हिण्डोला = झूला। सिरमौर = सबसे श्रेष्ठ, शिरोमणि। प्रतिपादित करना = सिद्ध करना, स्थापित करना। मर्मस्पर्शी = हृदय को छू लेनेवाली। अगुवा = नेता, आगे चलनेवाला। विरल = दुर्लभ, कम मिलनेवाला। नमस्य = नमस्कार के योग्य, पूज्य।
प्रश्न और अभ्यास — उत्तर
1हम संन्यासी किसे कहते हैं?
संन्यासी उन लोगों को कहते हैं जो अपनी इच्छा से घरबार छोड़ देते हैं, सुख के साधनों का त्याग कर देते हैं, गरीबी में जीते हैं और संसार को माया का जंजाल समझते हैं। अर्थात् संन्यासी गृह-त्यागी साधु होता है।
2विवेकानंद का व्यक्तित्व कैसा था?
विवेकानंद देखने में बहुत सुन्दर, बड़े ज्ञानी और पंडित थे। स्वभाव से सरल, विनयी और मिष्टभाषी थे, किन्तु साथ ही प्रचण्ड प्रतिभाशाली भी थे।
3विवेकानंद ने देशवासियों को क्या कहकर ललकारा?
स्वामीजी ने देशवासियों को ललकारा — ‘मेरे प्यारे देशवासियों! उठो, जागो। जीवन का वरदान स्वतंत्रता है, उसे प्राप्त करो। गर्व से कहो कि मैं भारतीय हूँ। हर भारतीय मेरा भाई है। भारत मेरा जीवन है, मेरा प्राण है। भारत के देवता मेरा भरणपोषण करते हैं...।’
4अमेरिका की धर्मसभा में स्वामीजी ने अपने भाषण में किस बात को प्रतिपादित किया?
अमेरिका की धर्मसभा में स्वामीजी ने बड़ी मर्मस्पर्शी वाणी में भारत के धर्म, आचार-विचार, ऋषि-मुनियों के चिंतन और आध्यात्मिक दृष्टिकोण का महत्त्व प्रतिपादित किया। अपने सुंदर, सरल तथा अर्थपूर्ण अंग्रेजी भाषण से उन्होंने सबके दिलों को अभिभूत कर दिया।
5स्वामीजी ने इंग्लैण्ड के लोगों को कैसे प्रभावित किया?
स्वामीजी लगभग एक साल इंग्लैण्ड में रहे और वहाँ के विद्वानों को अपनी विद्वत्ता (गहरे ज्ञान) से प्रभावित किया। वे भी मान गए कि भारत में गरीबी भले ही हो, पर वह ऊँचे विचारों और चिंतन का धनी तथा अगुवा है।
6स्वामीजी ने अपने अनुयायियों को किन-किन कामों में लगाया?
स्वामीजी ने अपने असंख्य अनुयायियों को मानव-सेवा, ज्ञान तथा धर्म-प्रचार में लगाया। उन्हीं के नाम से रामकृष्ण मिशन बना, जिसकी संस्थाएँ आज भी जनता की सेवा में डटी हुई हैं।
71857 के बाद हमारे देश के लोग किस स्थिति में थे?
सन् 1857 में लोग एक बार प्रयास करके पराजित हो चुके थे; इसके बाद वे निराशा, आलस्य और कर्महीनता में डूबे हुए थे। देश पराधीन था और अंग्रेजों का शासन चलता था।
8एक-एक वाक्य में उत्तर : (क) भारत कब पराधीन था? (ख) जीवन का वरदान क्या है? (ग) अंग्रेज क्या मान गये? (घ) देश को आजाद करने में किनका योगदान रहा? (ङ) कौन रामकृष्ण परमहंस के उपयुक्त शिष्य थे?
(क) सालों पहले, जब यहाँ अंग्रेजों का शासन था (परतंत्रता-काल में)। (ख) जीवन का वरदान स्वतंत्रता है। (ग) अंग्रेज मान गए कि भारत ऊँचे विचारों और चिंतन का धनी तथा अगुवा है। (घ) देशप्रेमी संन्यासियों (जैसे स्वामी विवेकानन्द) का। (ङ) स्वामी विवेकानन्द रामकृष्ण परमहंस के उपयुक्त शिष्य थे।
9एक शब्द / एक वाक्य में उत्तर : (क) धर्मसभा कहाँ हो रही थी? (ख) देशप्रेमी संन्यासी कौन हैं? (ग) स्वामीजी इंग्लैण्ड में कबतक रहे? (घ) भरण-पोषण कौन करता है? (ङ) स्वामीजी के गुरु कौन थे?
(क) अमेरिका में। (ख) स्वामी विवेकानन्द। (ग) लगभग एक साल। (घ) स्वामीजी के अनुसार भारत के देवता हमारा भरण-पोषण करते हैं। (ङ) रामकृष्ण परमहंस।
10एक शब्द / एक वाक्य में उत्तर : (च) सालों पहले भारत में किसका शासन चलता था? (छ) स्वामीजी बुढ़ापे का बैकुण्ठ किसे मानते हैं? (ज) स्वामीजी के बचपन का हिण्डोला कौन था? (झ) प्रत्येक भारतीय स्वामीजी के लिए क्या था? (ञ) स्वामीजी ने किसे जीवन का वरदान समझा?
(च) अंग्रेजों का। (छ) भारत को। (ज) भारत। (झ) प्रत्येक भारतीय उनके लिए भाई था। (ञ) स्वतंत्रता को।
11भाषा-ज्ञान — लिंग बताइए : वाणी, विद्वान, अंग्रेजी, दृष्टिकोण, आजादी, देश, संन्यासी, गरीबी, निराशा, आनन्द, बूढ़ापा।
स्त्रीलिंग — वाणी, अंग्रेजी, आजादी, गरीबी, निराशा। पुल्लिंग — विद्वान, दृष्टिकोण, देश, संन्यासी, आनन्द, बूढ़ापा।
12भाषा-ज्ञान — पर्यायवाची शब्द लिखिए : विद्वान, आजाद, साल, मानव, व्याकुल, इच्छा।
विद्वान = पंडित, ज्ञानी, सुधी। आजाद = स्वतंत्र, मुक्त, स्वाधीन। साल = वर्ष, बरस, संवत्। मानव = मनुष्य, आदमी, नर, इंसान। व्याकुल = बेचैन, अधीर, विकल। इच्छा = अभिलाषा, कामना, चाह, आकांक्षा।
13वाक्यों को शुद्ध करके लिखिए : (क) सालों पहले का बात है। (ख) रामकृष्ण परमहंस विवेकानंद का गुरु थे। (ग) देश में रामकृष्ण मिशन का अनेक संस्थाएँ हैं। (घ) गर्व में कहो की मैं भारतीय हूँ। (ङ) भारत मेरी जीवन है।
(क) सालों पहले की बात है। (ख) रामकृष्ण परमहंस विवेकानंद के गुरु थे। (ग) देश में रामकृष्ण मिशन की अनेक संस्थाएँ हैं। (घ) गर्व से कहो कि मैं भारतीय हूँ। (ङ) भारत मेरा जीवन है।
14विशेषण पद छाँटकर लिखिए : (क) मेरे प्यारे देशवासियों! (ख) यहाँ अंग्रेजों का कड़ा शासन चलता था। (ग) भारत मेरे बचपन का हिंडोला है। (घ) मेरे यौवन का आनंद लोक है। (ङ) भारत मेरे बुढ़ापे का बैकुण्ठ है।
(क) प्यारे। (ख) कड़ा। (ग) बचपन का (विशेषण रूप में प्रयुक्त)। (घ) यौवन का। (ङ) बुढ़ापे का।