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गद्य पाठ 4: गिल्लू

गद्य विभाग · पाठ 4 · हिन्दी सौरभ

हिन्दी (गद्य) · Odisha Board Class 10 · महादेवी वर्मा (संस्मरण) · 25 क्विज़

गिल्लू — लेखिका परिचय, संस्मरण का सार एवं शब्दार्थ

लेखिका परिचय : महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद शहर में सन् 1907 में हुआ। माता हेमरानी और पिता गोविन्दप्रसाद वर्मा — दोनों कुलीन व धनी परिवार के थे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. किया और प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्रिंसिपल बनीं; नारी-शिक्षा में उनका अमूल्य योगदान रहा। वे विदुषी, जागरूक एवं सहानुभूतिशील थीं — तेज बुद्धि और कोमल हृदय की धनी। उन्होंने नारी के स्नेह-प्रेम, त्याग-ममता और क्षमता की बेजोड़ छवियाँ आँकीं; नारी को ‘दीपशिखा’ कहा। वे छायावाद युग की प्रख्यात कवयित्री हैं और ‘प्यार और पीड़ा की लेखिका’ कही जाती हैं।

प्रमुख रचनाएँ — काव्य : नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा। रेखाचित्र : अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ। संस्मरण : पथ के साथी। निबंध व भूमिकाएँ : श्रृंखला की कड़ियाँ, क्षणदा, संकल्पिता। उन्होंने ‘चाँद’ पत्रिका का संपादन किया। उन्हें मंगला प्रसाद पारितोषिक, पद्म भूषण तथा ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

विधा : संस्मरण

‘गिल्लू’ महादेवी का एक संस्मरण है, जिसमें उन्होंने एक गिलहरी (गिल्लू) की जीवन-शैली का मार्मिक वर्णन किया है। इसमें प्राणि-मात्र के प्रति उनका प्रेम, करुणा और हृदय की संवेदनशीलता झलकती है। भाषा सरल, सजीव, चित्रमयी और प्रतीकों से युक्त है, जिसमें बीच-बीच में संस्कृत के शब्द मोतियों की भाँति चमकते हैं।

संस्मरण का सार

सोनजुही की लता में एक दिन पीली कली देखकर लेखिका को उस छोटे जीव (गिल्लू) का स्मरण हो आया जो उसी लता में छिपकर बैठता और लेखिका के पास पहुँचते ही कंधे पर कूदकर उन्हें चौंका देता था। एक दिन लेखिका ने देखा कि दो कौवे एक गमले के पास घायल गिलहरी के छोटे बच्चे को चोंच मार रहे थे। वह बच्चा घोंसले से गिर पड़ा था और निश्चेष्ट-सा गमले से चिपका पड़ा था। लेखिका ने उसे उठाकर रुई से रक्त पोंछा, घावों पर पेंसिलिन का मरहम लगाया और रुई की बत्ती से दूध पिलाने का प्रयास किया।

कई घंटे के उपचार के बाद उसके मुँह में एक बूँद पानी टपकाया जा सका। तीसरे दिन वह इतना स्वस्थ हो गया कि उसने लेखिका की उँगली पकड़ ली। तीन-चार मास में उसके चिकने रोएँ, झब्बेदार पूँछ और चंचल चमकीली आँखें सबको आकर्षित करने लगीं। जातिवाचक संज्ञा को व्यक्तिवाचक रूप देकर उसका नाम गिल्लू रख दिया गया। लेखिका ने फूलों की एक हलकी डलिया में रुई बिछाकर उसे खिड़की पर लटका दिया — वही दो वर्ष गिल्लू का घर रहा।

गिल्लू लेखिका का ध्यान आकर्षित करने के लिए पैर से परदे पर चढ़-उतरकर दौड़ लगाता। भूख लगने पर ‘चिक-चिक’ करके सूचना देता; काजू उसका प्रिय खाद्य था। पहला बसंत आने पर जब बाहर की गिलहरियाँ जाली के पास चिक-चिक करतीं, तो लेखिका ने उसे मुक्त करना आवश्यक समझकर जाली का एक कोना खोल दिया। गिल्लू दिन भर बाहर गिलहरियों के झुंड का नेता बनकर उछलता-कूदता और ठीक चार बजे लौट आता।

जब लेखिका मोटर दुर्घटना में घायल होकर अस्पताल में रहीं, तब गिल्लू ने बहुत कम काजू खाए। अस्वस्थता के समय वह तकिए पर सिरहाने बैठकर नन्हे पंजों से उनके सिर और बालों को सहलाता — मानो कोई परिचारिका (सेविका) सेवा कर रही हो। गर्मियों में वह लेखिका के पास रखी सुराही पर लेट जाता। गिलहरियों के जीवन की अवधि दो वर्ष से अधिक नहीं होती, अतः गिल्लू की जीवन-यात्रा का अंत आ गया। अंतिम रात वह झूले से उतरकर लेखिका के बिस्तर पर आया और ठंडे पंजों से उनकी वही उँगली पकड़कर, जिसे बचपन में मरणासन्न स्थिति में पकड़ा था, चिपक गया। प्रभात की प्रथम किरण के स्पर्श के साथ वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया।

उसका झूला उतार दिया गया और जाली बंद कर दी गई, पर गिलहरियों की नई पीढ़ी जाली के उस पार चिक-चिक करती रहती है और सोनजुही पर बसंत आता रहता है। गिल्लू को सोनजुही की लता के नीचे समाधि दी गई — इसलिए भी कि वह लता उसे सबसे प्रिय थी, और इसलिए भी कि उस लघुगात का किसी वासंती दिन जुही के पीताभ फूल में खिल जाने का विश्वास लेखिका को संतोष देता है।

शब्दार्थ

गिल्लू = गिलहरी (गिलाई, चेखुरा) — चूहे जैसी मोटी रोएँदार पूँछवाला छोटा जीव जो पेड़ों पर रहता है। काक भुशुण्डि = एक ब्राह्मण जो लोमश मुनि के शाप से कौआ हो गए थे और प्रभु श्रीराम के बड़े भक्त थे। अवमानित = अपमानित। पितरपक्ष = क्वाँर की कृष्ण प्रतिपदा से अमावस्या तक का समय, जब मृत पूर्वजों के नाम पर श्राद्ध किया जाता है। कीलें = काँटा, खूँटी। सिरहाने = चारपाई में सिर की ओर का भाग। वासंती = वसंत-संबंधी, मदनोत्सव। सोनजुही = एक प्रकार का पीला फूल। अनायास = आसानी से, बिना प्रयास। हरीतिमा = हरियाली। लघुप्राण/लघुगात = छोटा जीव/छोटा शरीर। छूआ-छुऔवल = छूने-छिपने का खेल। समादरित = विशेष आदर। अनादरित = आदर का अभाव, तिरस्कार। अवतीर्ण = प्रकट। कर्कश = कटु, कानों को न भानेवाला। काकद्वय = दो कौए। निश्चेष्ट = बिना किसी हरकत के। आश्वस्त = निश्चिंत। स्निग्ध = चिकना। विस्मित = आश्चर्यचकित। अपवाद = सामान्य नियम को बाधित करनेवाला। घोंसला = नीड़। परिचारिका = सेविका। मरणासन्न = जिसकी मृत्यु निकट हो। उष्णता = गरमी। पीताभ = पीले रंग का।

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