हिन्दी (गद्य) · Odisha Board Class 10 · संकलित — ओड़िशा का इतिहास (निबंध) · 25 क्विज़
जननी जन्मभूमि — पाठ-परिचय, विषय-वस्तु, सार एवं शब्दार्थ
पाठ-परिचय (संकलित)
यह संकलित निबंध हमारी जन्मभूमि ओड़िशा (उत्कल, कलिंग, कोशल आदि) के गौरवशाली इतिहास और वर्तमान प्रगति के बारे में जानकारी देता है। कलिंग के लोग बड़े वीर और साहसी थे; कलिंग की सेना ने सम्राट अशोक की सेना का डटकर मुकाबला किया। मध्यकाल में गजपति राजाओं ने गंगा से गोदावरी तक राज्य फैलाया। उत्कल भूमि मंदिर-मूर्तियाँ बनाने की कला तथा चित्रकला-शिल्प में प्रख्यात रही। स्वतंत्रता के बाद यहाँ अनेक उद्योग, कारखाने व बंदरगाह स्थापित हुए और यह प्रांत आज प्रगति के पथ पर चल रहा है।
जन्मभूमि : ओड़िशा के नाम
ओड़ देश या ओड़िशा के कई नाम मिलते हैं — कलिंग, उत्कल, कंगोद और कोशल। एक-एक नाम किसी अंचल या काल में अधिक प्रिय हुआ। ‘उत्कल’ का अर्थ है — उत्कृष्ट (श्रेष्ठ) कला का देश।
पाठ का सार
संसार की विविधता : यह दुनिया बड़ी अजीब (निराली) है — इसमें पहाड़, जंगल, नदियाँ, झरने, सागर, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और नर-नारी सब हैं। भला भी है तो बुरा भी। तुलसीदास कहते हैं — ‘जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।’ यह विविधता का भंडार है; अच्छे लोग अच्छाई को चुनते हैं, जैसे हंस दूध पी लेता है और पानी छोड़ देता है। संसार हर पल बदलता है — ऋतुएँ, मौसम, सुख-दुःख, अमीरी-गरीबी सब बदलते रहते हैं। पर मनुष्य अंधेरी रात से डरता नहीं, लड़ता है; उसकी अदम्य जिज्ञासा नया-नया इतिहास रचती है।
इतिहास का पहला पन्ना — कलिंग का शौर्य : ईस्वी पूर्व तीसरी शताब्दी में लिखा है — ‘कलिंगा: साहसिका:’, क्योंकि कलिंग के सैनिकों ने विशाल मगध-सेना के दाँत खट्टे कर दिए। उन्होंने सम्राट अशोक का डटकर मुकाबला किया — जानें दीं, पर जमीन नहीं दी। लाखों मरे, लाखों बंदी बने; ‘दया’ नदी में रक्त की धारा बह चली। इस भीषण नरसंहार से प्रचंड अशोक घबरा गया और धर्मशोक बन गया — उसने युद्ध छोड़ा, तलवार फेंकी और मानव-प्रेम व अहिंसा की नीति अपनाई। धौली के अशोकीय शिलालेख इसका बयान करते हैं। बाद में कलिंग सम्राट खारवेल ने मगध पर आक्रमण कर ‘कलिंग जिन’ (मगध से लाई मूल्यवान वस्तु/मूर्ति) वापस ले आया; खण्डगिरि-उदयगिरि के शिलालेख व गुफाएँ उसका यशोगान करती हैं। आधुनिक युग में बक्सि जगबन्धु, सुरेन्द्र साय, चाखि खुण्टिया, चक्रधर बिसोई, लक्ष्मण नायक जैसे साहसी सपूतों ने अंग्रेजों को भी चैन से नहीं बैठने दिया — प्राण दे दिये, पर अन्याय नहीं सहा।
इतिहास का दूसरा पन्ना — उत्कृष्ट कला : उत्कल कलाओं का देश है। भुवनेश्वर, पुरी और कोणार्क के विशाल मंदिर आज भी सिर उठाये खड़े हैं — ये दुनिया के अजूबे हैं। हजारों नारी-मूर्तियाँ, हाथी-घोड़े-पहिये-कमल, रथाकार मंदिर, नृत्य-गान का माहौल! ओड़िशा के सूती व पाट के वस्त्र, सोने-चाँदी के गहने, काँसे-पीतल के बर्तन, सींग की कलाकृतियाँ विदेशी बाजार का आकर्षण रहीं; ओड़िशी चित्रकला, नृत्य व संगीत विदेशों में लोकप्रिय हैं। ओड़िआ साधव (बनिये) छोटे-बड़े नावों में सुदूर पूर्वी द्वीपों में व्यापार फैलाये हुए थे — वे न तूफान से डरते, न गहरे सागर से; नारा देते — ‘आ का मा भै’ (हमें किसी का डर नहीं)। चिलिका झील उत्कल-लक्ष्मी की विलास-सरोवर रही। पर जैसे दीपक जलता है तो बुझता भी है — ओड़िशा का यह शौर्य, ऐश्वर्य और वैभव काल के गर्भ में विलीन हो गया; उसका पतन हो गया।
पुनर्जागरण : बीसवीं शती के आरंभ में महापुरुष मधुसूदन (दास) ने यह इतिहास पढ़ा; उनका दिल भर आया। उन्होंने सोते को जगाया — ‘हे उत्कल के सपूतो! उठो, जागो! अपने पुराने गौरव को याद करो... अब तो उठो! करो या मरो।’ ओड़िशावासियों ने यह पुकार सुनी — अप्रैल 1936 को स्वतंत्र ओड़िशा प्रदेश बना। उत्कल विश्वविद्यालय स्थापित हुआ, स्कूल-कॉलेज, इंजीनियरिंग व मेडिकल कॉलेज खुले। हीराकुद बाँध बना, खेतों की सिंचाई हुई, अनाज बढ़ा; राउरकेला से लोहे का उत्पादन, सुनाबेड़ा में हवाई जहाज, पराद्वीप बंदरगाह से नौवाणिज्य; इम्फा, नालको, जिन्दल, वेदान्त जैसी कंपनियाँ; चाँदीपुर और बडमाल में रक्षा-सामग्री बनने लगी।
संदेश : सदियों बाद फिर ओड़िशा की किस्मत पलटी है — वह प्रगति के रास्ते पर है, दूसरे राज्यों के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चल रहा है। हम सबको इससे लाभ उठाना चाहिए और नये उद्यमों में भागीदारी करनी चाहिए — तभी ओड़िशा का नया गौरवशाली इतिहास बन सकेगा।
शब्दार्थ
निराला = विचित्र, अनोखा। स्थावर = स्थिर रहनेवाले। जंगम = चलने-फिरनेवाले। जड़ = लकड़ी-पत्थर जैसी वस्तुएँ। चेतन = जीव। सुहावना = सुखकर। फकीरी = गरीबी। खुशहाली = सुख का वक्त। बदहाली = बुरा समय। गम = दुःख। पन्ना = पृष्ठ। सिलसिला = कड़ी, क्रम। अजूबा = आश्चर्य-वस्तु। झील = बड़ा जलाशय। शौर्य = वीरत्व। आखिरकार = अंत में। सपूत = सुपुत्र। हंस का विवेक (नीर-क्षीर विवेक) = गुण को ग्रहण करना और दोष को छोड़ना। चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात = कुछ दिन सुख के फिर दुःख (कहावत)। दिल दहलना = डर जाना। कलिंग जिन = वह मूल्यवान वस्तु जो मगध से लायी गयी थी। आ का मा भै = ओड़िशा के बनिये समुद्र में बोहित (नाव) छोड़ते वक्त यह नारा देते थे (हमें किसी का डर नहीं)। विलास सरोवर = चिलिका, व्यापार का केन्द्र जहाँ धनरत्न आते थे। अदम्य = न दबनेवाली। जिज्ञासा = जानने की इच्छा।
प्रश्न और अभ्यास — उत्तर
1इस दुनिया को विचित्र (निराला) क्यों कहा जाएगा?
क्योंकि इस दुनिया में विविधता का भंडार है — बड़े-बड़े पहाड़, घने जंगल, कलकल करती नदियाँ, झरने, गरजते सागर, तरह-तरह के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और नर-नारी सब हैं। यहाँ भला भी है तो बुरा भी, जड़-चेतन, चर-अचर सब हैं। इसी विविधता और परिवर्तनशीलता के कारण यह दुनिया विचित्र (निराली) है।
2दुनिया बदलती है, इसके क्या प्रमाण हैं?
संसार हर पल बदलता रहता है — ऋतुएँ बदलती हैं, मौसम कभी सुहावना तो कभी डरावना होता है; कभी जानलेवा गर्मी तो कभी कड़ाके की सर्दी; कहीं हरीभरी फसल तो कहीं अकाल; आदमी कभी सुख-चैन से जीता है तो कभी दुःखी होता है; कहीं अमीरी है तो कहीं गरीबी — ये सब परिवर्तन इसके प्रमाण हैं।
3‘कलिंगा: साहसिका:’ — ऐसा क्यों कहा गया है?
ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि कलिंग के सैनिक अत्यंत वीर और साहसी थे। उन्होंने विशाल मगध-सेना के दाँत खट्टे कर दिए और सम्राट अशोक का डटकर मुकाबला किया — ‘जानें दीं, पर जमीन नहीं दी’। उनके इसी असाधारण साहस के कारण उन्हें ‘कलिंगा: साहसिका:’ (कलिंग के लोग साहसी हैं) कहा गया।
4धर्मशोक ने क्या किया?
कलिंग-युद्ध के भीषण नरसंहार (लाखों की मृत्यु, ‘दया’ नदी में रक्त की धारा) से अशोक का हृदय घबरा गया और वह ‘धर्मशोक’ बन गया। उसने युद्ध छोड़ दिया, तलवार फेंक दी और मानव-प्रेम तथा अहिंसा की नीति अपनाई। धौली के अशोकीय शिलालेख इसका बयान करते हैं।
5वीरत्व की कहानी आगे कैसे बढ़ी?
कलिंग सम्राट खारवेल ने मगध पर आक्रमण कर उसे पराजित किया और ‘कलिंग जिन’ (जो मूल्यवान वस्तु मगध ले गया था) वापस ले आया। खण्डगिरि-उदयगिरि के शिलालेख और गुफाएँ खारवेल का यशोगान करती हैं। इस प्रकार कलिंग के शौर्य की अमर कहानी आगे बढ़ी।
6धौली के शिलालेख में क्या लिखा है? / धौली के शिलालेख क्या कहते हैं?
धौली के अशोकीय शिलालेख बताते हैं कि कलिंग-युद्ध के बाद अशोक का हृदय परिवर्तित हो गया — उसने हिंसा त्यागकर मानव-प्रेम और अहिंसा की नीति अपनाई तथा धर्मशोक बन गया। ये शिलालेख उसी गौरवशाली एवं हृदय-परिवर्तक घटना की उद्घोषणा करते हैं।
7‘उत्कल’ का क्या अर्थ है? / ओड़िशा के मंदिर अजूबे क्यों हैं?
‘उत्कल’ का अर्थ है — उत्कृष्ट (श्रेष्ठ) कला का देश।
ओड़िशा के मंदिर अजूबे इसलिए हैं क्योंकि भुवनेश्वर, पुरी और कोणार्क के ये भव्य व विशाल स्थापत्य सदियों बाद भी सिर उठाये खड़े हैं; इनमें हजारों नारी-मूर्तियाँ, हाथी-घोड़े-पहिये-कमल, रथाकार मंदिर, नृत्य-गान का माहौल और द्वारपाल-दिक्पालों की कलाकृतियाँ हैं, जो देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए जादू के नमूने हैं।
8ओड़िशा के बनिये क्या करते थे? / बक्सि जगबन्धु आदि ने क्या किया?
ओड़िआ साधव (बनिये) छोटे-बड़े नावों में सुदूर पूर्वी द्वीपों तक व्यापार फैलाये हुए थे; वे न तूफान से डरते, न गहरे सागर से, और धनरत्नों से नौकाएँ भर-भर कर घर लौटते थे।
बक्सि जगबन्धु, सुरेन्द्र साय आदि साहसी सपूतों ने अंग्रेजों को चैन से नहीं बैठने दिया — उन्होंने प्राण दे दिये, मगर अन्याय नहीं सहा।
9मधुसूदन ने क्या किया? / मधुबाबू की पुकार सुनकर क्या हुआ?
बीसवीं शती के आरंभ में महापुरुष मधुसूदन दास ने ओड़िशा का गौरवशाली इतिहास पढ़ा; उनका दिल भर आया। उन्होंने सोते हुए ओड़िशावासियों को ललकारा — ‘हे उत्कल के सपूतो! उठो, जागो! अपने पुराने गौरव को याद करो... करो या मरो।’
मधुबाबू की यह पुकार सुनकर ओड़िशावासी जाग उठे और अप्रैल 1936 को स्वतंत्र ओड़िशा प्रदेश बना; अनेक सुधी नेता नवनिर्माण में जुट गए।
10ओड़िशा ने कैसे प्रगति की? / ओड़िशा आज पीछे नहीं है — क्या प्रमाण है? / आजकल क्या-क्या नए उद्योग हो रहे हैं?
स्वतंत्र प्रदेश बनने के बाद ओड़िशा ने हर क्षेत्र में प्रगति की — उत्कल विश्वविद्यालय, स्कूल-कॉलेज, इंजीनियरिंग व मेडिकल कॉलेज खुले; हीराकुद बाँध बना, सिंचाई व अनाज बढ़ा; राउरकेला में लोहा, सुनाबेड़ा में हवाई जहाज, पराद्वीप बंदरगाह से नौवाणिज्य; इम्फा, नालको, जिन्दल, वेदान्त जैसी कंपनियों ने धातु-द्रव्य बनाए; चाँदीपुर व बडमाल में रक्षा-सामग्री बनने लगी। यही इसकी प्रगति और उत्थान के प्रमाण हैं।
11एक-एक वाक्य : (क) नीर-क्षीर का विवेक किसके पास है? (ख) आदमी के जीवन का इतिहास क्या है? (ग) कलिंगवासी किसके नेतृत्व में लड़े? (घ) अशोक ने कौन-सी नीति अपनाई? (ङ) खण्डगिरि की गुफाएँ किसका यशोगान करती हैं?
(क) हंस के पास (जो दूध पी लेता है, पानी छोड़ देता है)। (ख) आदमी के जीवन का इतिहास उसके उत्थान और पतन की कहानी है। (ग) कलिंगवासी (अपने वीर सेनापति/राजा के) नेतृत्व में लड़े (नाम इतिहास में दर्ज नहीं)। (घ) मानव-प्रेम और अहिंसा की नीति। (ङ) कलिंग सम्राट खारवेल का।
12एक-एक वाक्य : (च) स्वतंत्र ओड़िशा प्रदेश कब बना? (छ) लोहे का उत्पादन कहाँ होने लगा? (ज) देश के लिए आधुनिक रक्षा-सामग्रियाँ कहाँ बनने लगीं? (झ) विदेशी पर्यटकों के लिए ये मंदिर कैसे हैं? (ञ) स्वतंत्र ओड़िशा प्रदेश बनने पर कौन-सा विश्वविद्यालय स्थापित हुआ?
(च) अप्रैल 1936 को। (छ) राउरकेला में। (ज) चाँदीपुर और बडमाल में। (झ) जादू के नमूने (अजूबे) जैसे। (ञ) उत्कल विश्वविद्यालय।
13भाषा-ज्ञान — विलोम शब्द लिखिए : स्थावर, जड़, गुण, सर्दी, खुशी, सुख, अँधेरा, खुशहाली, उत्थान, बढ़िया, वीर, युद्ध, अहिंसा, सजीव, बड़ा।
स्थावर × जंगम। जड़ × चेतन। गुण × दोष। सर्दी × गर्मी। खुशी × गम। सुख × दुःख। अँधेरा × उजाला। खुशहाली × बदहाली। उत्थान × पतन। बढ़िया × घटिया। वीर × कायर। युद्ध × शांति। अहिंसा × हिंसा। सजीव × निर्जीव। बड़ा × छोटा।
14भाषा-ज्ञान — मुहावरों के अर्थ : दाँत खट्टे करना, दिल दहलना, जान की बाजी लगाना, धावा बोलना, दिल भर आना, दाने-दाने का मोहताज, बीड़ा उठाना।
दाँत खट्टे करना = बुरी तरह हराना। दिल दहलना = डर जाना। जान की बाजी लगाना = प्राणों की परवाह न करना। धावा बोलना = आक्रमण करना। दिल भर आना = भावुक हो जाना। दाने-दाने का मोहताज = बहुत गरीब/अभावग्रस्त होना। बीड़ा उठाना = किसी काम का दृढ़ संकल्प लेना।
15भाषा-ज्ञान — पर्यायवाची : आदमी, प्राण, युद्ध, प्रांत, नाव, मौसम, पन्ना, अमूल्य, द्वीप, किस्मत।
आदमी = मनुष्य, मानव। प्राण = जान। युद्ध = लड़ाई, जंग। प्रांत = प्रदेश, राज्य। नाव = नौका, नैया। मौसम = ऋतु। पन्ना = पृष्ठ। अमूल्य = अनमोल, बहुमूल्य। द्वीप = टापू। किस्मत = भाग्य, तकदीर।