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पाठ 3: एक तिनका

पद्य विभाग · पाठ 3 · हिन्दी सौरभ

हिन्दी (पद्य) · Odisha Board Class 10 · अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ · 25 क्विज़

एक तिनका — कवि परिचय, मूल कविता, शब्दार्थ एवं भावार्थ

कवि परिचय : अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का जन्म उत्तर प्रदेश के अजमगढ़ जिले के निजामाबाद कस्बे में सन् 1865 में हुआ था। स्कूली शिक्षा के बाद वे सरकारी नौकरी में लगे और हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में अध्यापक भी रहे। हिन्दी, संस्कृत और फारसी के अच्छे जानकार थे। हरिऔध जी खड़ीबोली हिन्दी के प्रथम कवियों में हैं; उनकी भाषा सरल, मुहावरेदार और भावगर्भक होती है। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं — प्रिय प्रवास, वैदेही वनवास, कर्मवीर, रसकलश, चोखे चौपदे, चुभते चौपदे आदि।

कविता का सार

यह एक छोटी-सी किंतु बड़े काम की कविता है। छोटी-छोटी चीजें ही हमारे जीवन को एकदम बदल देती हैं। कवि कहते हैं कि एक दिन वे घमंड में भरकर अकड़े हुए छत की मुँडेर पर खड़े थे। तभी कहीं दूर से उड़ता हुआ एक छोटा-सा तिनका उनकी आँख में आ गिरा। कवि झुँझलाकर बेचैन हो उठे — आँख जल रही थी, लाल होकर दुखने लगी। लोग कपड़े की मूँठ देकर आँख सेंकने लगे, पर दर्द कम नहीं हुआ; कवि का घमंड (ऐंठ) मानो चुपचाप भाग गया। जब किसी तरह आँख से तिनका निकला, तो कवि का विवेक (‘समझ’) उन्हें ताना मारने लगा — ‘तू इतना अकड़ क्यों रहा था? तेरे अहंकार को तोड़ने के लिए तो एक छोटा-सा तिनका ही बहुत है।’ कविता का संदेश यही है कि मनुष्य को कभी घमंड नहीं करना चाहिए।

मूल कविता

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ, एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा। आ अचानक दूर से उड़ता हुआ, एक तिनका आँख में मेरी पड़ा॥

मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा, लाल होकर आँख भी दुखने लगी। मूँठ देने लोग कपड़े की लगे, ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भागी॥

जब किसी ढब से निकल तिनका गया, तब ‘समझ’ ने यों मुझे ताने दिए। ऐंठता तू किसलिए इतना रहा, एक तिनका है बहुत तेरे लिए॥

शब्दार्थ: तिनका = सूखी घास। घमंड = गर्व, अहंकार। ऐंठ = जिद, अकड़। मुंडेरे = दीवाल का सबसे ऊपरी भाग (जो छत के ऊपर रहता है)। अचानक = सहसा। झिझकना = हिचकिचाना। बेचैन = व्याकुल, बेकल। मूँठ = कपड़े का गुब्बारा जो आँख को सेंकता है। दबे पाँव = चुपचाप। ढब = तरीका, रीति, ढंग। ताना = चिढ़कर कहना।

भावार्थ

पहला पद: कवि कहते हैं कि एक दिन वे घमंड में भरकर अकड़े हुए छत की मुँडेर पर खड़े थे। तभी अचानक कहीं दूर से उड़ता हुआ एक छोटा-सा तिनका उनकी आँख में आकर गिर पड़ा। अर्थात् अभिमान के चरम क्षण में ही एक तुच्छ वस्तु ने उन्हें विचलित कर दिया।

दूसरा पद: तिनका गिरते ही कवि हिचककर बेचैन हो उठे; आँख लाल होकर दुखने लगी। आसपास के लोग कपड़े की मूँठ से आँख सेंकने लगे। इस पीड़ा के सामने कवि का सारा घमंड (ऐंठ) बेचारा बनकर चुपचाप भाग गया — अर्थात् एक छोटी-सी तकलीफ ने अहंकार को गायब कर दिया।

तीसरा पद: जब किसी तरह आँख से तिनका निकला, तब कवि की अपनी ‘समझ’ (विवेक) उन्हें ताना मारने लगी — हे मनुष्य! तू इतना अकड़ और घमंड किसलिए करता रहा? तेरे अहंकार को चूर-चूर करने के लिए तो यह एक छोटा-सा तिनका ही पर्याप्त है। इस प्रकार कवि को अपने घमंड की व्यर्थता का बोध होता है।

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