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पाठ 4: चाँद का झिंगोला

पद्य विभाग · पाठ 4 · हिन्दी सौरभ

हिन्दी (पद्य) · Odisha Board Class 10 · रामधारी सिंह ‘दिनकर’ · 25 क्विज़

चाँद का झिंगोला — कवि परिचय, मूल कविता, शब्दार्थ एवं भावार्थ

कवि परिचय : रामधारी सिंह ‘दिनकर’

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी का जन्म 30 सितम्बर, सन् 1908 को सिमरिया घाट, मुंगेर (बिहार) में हुआ। छात्रावस्था में ही ‘दिनकर’ का ओजस्वी कवि-रूप सामने आ गया। वे राष्ट्रीय भावधारा के प्रमुख कवि रहे और उन्हें शौर्य एवं वीरता का कवि माना जाता है। उनकी प्रतिभा गद्य और पद्य दोनों में फैली। प्रमुख काव्य-ग्रंथ — रेणुका, हुँकार, रसवंती, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, हारे को हरिनाम, बापू, दिल्ली; गद्य-ग्रंथ — देश-विदेश, मेरी यात्राएँ, अर्द्ध-नारीश्वर, मिट्टी की ओर, संस्कृति के चार अध्याय आदि। वे राज्य सभा के सम्मानित सदस्य रहे; भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया और ‘उर्वशी’ महाकाव्य के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया।

कविता का सार

बच्चे दिन-ब-दिन बढ़ते हैं, इसलिए उनकी पोशाक बड़ी साइज की बना ली जाती है। पर चाँद तो घटता-बढ़ता रहता है और अमावस के दिन तो बिलकुल दिखाई ही नहीं देता। कविता में बालक-चाँद माँ से हठ करता है कि ऊन का एक मोटा झिंगोला (अंगरखा/कुरता) सिलवा दो, क्योंकि रात भर सन-सन चलती हवा और जाड़े में वह ठिठुरते हुए यात्रा पूरी करता है। माँ प्यार से समझाती है कि तेरी तो कोई एक नाप ही नहीं — तू कभी एक उँगल चौड़ा, कभी एक फुट मोटा; कभी बड़ा तो कभी छोटा हो जाता है, और अमावस को तो किसी को दिखाई ही नहीं पड़ता। ऐसे में तेरी नाप किस दिन ली जाए जो हर दिन बदन में आ सके? इस कविता में एक सुंदर मजाक और व्यंग्य है — सदा बदलते रहने वाले (अस्थिर) के लिए कुछ भी स्थायी नहीं बनाया जा सकता।

मूल कविता

हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से वह बोला, “सिलवा दो माँ, मुझे ऊन का, मोटा एक झिंगोला। सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ, ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह, यात्रा पूरी करता हूँ। आसमान का सफर और यह, मौसम है जाड़े का” न हो अगर तो ला दो कुरता ही कोई भाड़े का।”

बच्चे की सुन बात कहा माता ने, “अरे सलोने! कुशल करे भगवान, लगें मत, तुझको जादू-टोने। जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ, एक नाप में कभी नहीं, तुझको देखा करती हूँ। कभी एक उँगल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा, बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा। घटना-बढ़ता रोज, किसी दिन, ऐसा भी करता है, नहीं किसी की आँखों का, तू दिखलाई पड़ता है। अब तू ही यह बता, नाप तेरी किस रोज लिवाएँ, सी दें एक झिंगोला जो, हर रोज बदन में आए?”

शब्दार्थ: झिंगोला = छोटे बच्चों का अंगरखा या कमीज। हठ = जिद। ऊन/उन = भेड़-बकरी आदि के रोयें। आसमान = आकाश, गगन, नभ। नाप = माप। सफर = यात्रा। मौसम = ऋतु। जाड़ा = शीत। भाड़ा = किराया। सलोने = सुंदर, मनोहर।

भावार्थ

पहला पद: एक दिन बालक-चाँद हठ करके माँ से कहता है — माँ, मुझे ऊन का एक मोटा झिंगोला सिलवा दो। रात भर सन-सन हवा चलती है और जाड़े में मैं ठिठुरता हूँ; किसी तरह काँपते हुए अपनी (आकाश की) यात्रा पूरी करता हूँ। आसमान का सफर और ऊपर से जाड़े का मौसम — यदि नया न बने तो किराये का ही कोई कुरता ला दो। (यहाँ चाँद बालक-सा सरल और जिद्दी दिखाया गया है।)

दूसरा पद: बच्चे की बात सुनकर माँ प्यार से कहती है — अरे सलोने! भगवान तेरी कुशल करे, तुझे किसी की नज़र/जादू-टोना न लगे। जाड़े की बात तो ठीक है, पर मैं इसलिए डरती हूँ कि तू कभी एक ही नाप में दिखाई नहीं देता — कभी एक उँगल चौड़ा, कभी एक फुट मोटा; कभी बड़ा, कभी छोटा। रोज घटता-बढ़ता रहता है और किसी दिन (अमावस को) तो किसी की आँखों को दिखाई ही नहीं देता। अब तू ही बता, तेरी नाप किस दिन ली जाए जिससे ऐसा झिंगोला सिल दें जो हर रोज तेरे बदन में आ जाए? (इसी में कवि का मीठा व्यंग्य है कि जो वस्तु सदा बदलती रहती है, उसके लिए कुछ भी स्थायी नहीं बनाया जा सकता।)

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