पद्य विभाग · पाठ 6 (अंतिम) · हिन्दी सौरभ
हिन्दी (पद्य) · Odisha Board Class 10 · रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ · 25 क्विज़
कवि रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ का जन्म सन् 1915 में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के किशनपुर गाँव में हुआ। उच्च शिक्षा प्राप्त कर सरकारी नौकरी की, बाद में हिन्दी के प्रोफेसर हो गये। उनके पास अनुभव और कल्पना-शक्ति दोनों थे। आरंभ में सूक्ष्म मनोभावों पर लिखा; उनकी कविता में मानव और प्रकृति के सौन्दर्य, यौवन, स्नेह-प्रेम, दुःख-दर्द के भावात्मक चित्र मिलते हैं। बाद में उन्होंने समाज की विषमता, अन्याय-अत्याचार, शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई और मानवता का पक्ष लिया — वे छायावाद से प्रगतिवाद के दौर में आए। प्रमुख रचनाएँ — अपराजिता, मधूलिका, लाल चूनर, किरण वेला, वर्षान्त के बादल, विराम चिह्न आदि।
यह कवि की एक प्रगतिशील रचना है। कवि का आग्रह है कि आदमी स्वार्थी नहीं, परोपकारी बने। वह दूसरों को दुःख नहीं, सुख दे; और यदि सुख न दे सके तो कम-से-कम किसी को कष्ट न पहुँचाए। इसीलिए कवि कहते हैं — यदि तुम किसी के रास्ते पर फूल नहीं बो सकते, तो कम-से-कम काँटे तो मत बोओ। अपने मन को सुख-दुःख के चक्कर में डालकर छोटा न करो; दूसरों को स्नेह, प्रेम और ममता की शीतल छाया दो; ईर्ष्या की कटुता समाप्त करो, क्योंकि शान्ति-सौहार्द के सुखद स्पर्श से जीवन की ज्वालाएँ बुझ जाती हैं। अपने व्यक्तिगत दुःख और क्रोध से वातावरण को दुःखी मत करो। संकट में मुस्कुरा न सको तो व्याकुल/कातर होकर रोओ भी मत — आशा के सपने देखो, शान्ति से उसे पाने की चेष्टा करो। जीवन सुख-दुःख दोनों से बना है; जो दुःख में भी जी सका, जागकर जीवन भोगा, वही सच्चा चेतन प्राणी है। संकट से मुँह मोड़ना, संघर्ष न करना कायरता है। जैसे बादलों की गड़गड़ाहट के बीच भी पवन का जयघोष बंद नहीं होता, वैसे ही संकट चाहे कितना गहरा हो, अपना विश्वास, धैर्य और साहस नहीं खोना चाहिए — नहीं तो आदमी ‘जिंदा लाश’ बन जाएगा।
यदि फूल नहीं बो सकते तो काँटे कम से कम मत बोओ!
(1)
है अगम चेतना की घाटी, कमजोर बड़ा मानव का मन; ममता की शीतल छाया में होता कटुता का स्वयं शमन! ज्वालाएँ जब धुल जाती हैं, खुल-खुल जाते हैं मुँदे नयन। होकर निर्मलता में प्रशान्त बहता प्राणों का क्षुब्ध पवन। संकट में यदि मुस्का न सको, भय से कातर हो मत रोओ! यदि फूल नहीं बो सकते तो, काँटे कम से कम मत बोओ!
(2)
हर सपने पर विश्वास करो, लो लगा चाँदनी का चन्दन, मत याद करो, मत सोचो—ज्वाला में कैसे बीता जीवन, इस दुनिया की है रीति यही —सहता है तन, बहता है मन, सुख की अभिमानी मदिरा में जो जाग सका, वह है चेतन! इसमें तुम जाग नहीं सकते, तो सेज बिछाकर मत सोओ! यदि फूल नहीं बो सकते तो, काँटे कम से कम मत बोओ!
(3)
पग-पग पर शोर मचाने से मन में संकल्प नहीं जमता, अनसुना अचीह्ना करने से संकट का वेग नहीं कमता, संशय के सूक्ष्म कुहासे में विश्वास नहीं क्षण भर रमता, बादल के घेरों में भी तो जय घोष न मारुत का थमता। यदि बढ़ न सको विश्वासों पर साँसों के मुरदे मत ढोओ! यदि फूल नहीं बो सकते तो, काँटे कम से कम मत बोओ!
शब्दार्थ: अगम = अथाह, दुर्गम, जहाँ कोई न जा सके। चेतना = चैतन्य, ज्ञान, बुद्धि। घाटी = पर्वतों के बीच का संकरा मार्ग। कटुता = कड़वापन। शमन = दमन, शान्ति। ज्वालाएँ = अग्निशिखा, लपट। क्षुब्ध = व्याकुल, कुपित। कातर = अधीर, व्याकुल। मदिरा = शराब, नशा। कुहासा = कुहरा, कुहेलिका। मारुत = वायु, हवा। जयघोष = जयजयकार। साँसों के मुरदे = जिंदा लाश।
टेक: कवि का मूल संदेश — ‘यदि फूल नहीं बो सकते तो काँटे कम-से-कम मत बोओ!’ अर्थात् यदि किसी को सुख नहीं दे सकते तो कम-से-कम दुःख तो मत दो।
पद (1): मानव की चेतना बहुत गहरी (अगम) है और उसका मन बड़ा कमजोर है। ममता की शीतल छाया में कड़वाहट (कटुता) स्वयं शान्त हो जाती है; प्रेम मिलते ही मन की ज्वालाएँ (क्रोध/दुःख की लपटें) धुल जाती हैं और बंद आँखें खुल जाती हैं (ज्ञान/आशा जाग उठती है)। निर्मलता पाकर प्राणों का व्याकुल पवन (मन) शान्त होकर बहने लगता है। इसलिए कवि कहते हैं — संकट में यदि मुस्कुरा न सको तो भय से व्याकुल होकर रोओ भी मत; धैर्य रखो, पर दूसरों के लिए काँटे मत बोओ।
पद (2): हर सपने पर विश्वास करो, जीवन में चाँदनी-सी शीतलता और आशा लाओ। बीते दुःखों (ज्वाला में बीते जीवन) को बार-बार याद मत करो। दुनिया की रीति यही है कि तन कष्ट सहता है और मन बहता (संघर्ष करता) रहता है। सुख के अभिमान रूपी नशे में भी जो जागता (सचेत) रहा, वही सच्चा चेतन प्राणी है। यदि तुम जाग (सचेत होकर जीवन भोग) नहीं सकते, तो आराम की सेज बिछाकर सो भी मत जाओ — अर्थात् निष्क्रिय/आलसी मत बनो।
पद (3): कदम-कदम पर केवल शोर मचाने से मन में दृढ़ संकल्प नहीं बनता, और संकट को अनसुना-अनदेखा कर देने से उसका वेग कम नहीं होता। संशय (शक) के सूक्ष्म कुहरे में विश्वास क्षण भर भी नहीं टिकता। जैसे बादलों के घेरों (गर्जना) के बीच भी पवन (मारुत) का जयघोष नहीं रुकता, वैसे ही संकट में भी साहस बनाए रखो। यदि अपने विश्वासों के बल पर आगे नहीं बढ़ सकते, तो कम-से-कम ‘साँसों के मुरदे’ (जिंदा लाश) बनकर मत जियो — निराश, निष्क्रिय जीवन मत ढोओ।
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