पद्य विभाग · पाठ 5 · हिन्दी सौरभ
हिन्दी (पद्य) · Odisha Board Class 10 · हरिवंशराय बच्चन · 25 क्विज़
हरिवंशराय बच्चन का जन्म सन् 1907 में इलाहाबाद में हुआ था। अंग्रेजी की उच्च शिक्षा इलाहाबाद तथा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (इंग्लैण्ड) में हुई। वे कुछ दिन अध्यापक रहे, आकाशवाणी में काम किया, फिर विदेश विभाग में हिन्दी सलाहकार रहे। बचपन से ही कविता-रुचि थी। उनकी कविताओं में जीवन और जीने के लिए किए जाने वाले कार्यों का वर्णन है; उन्होंने जीवन को अत्यंत महत्व दिया। ‘दो चट्टानों के लिए’ पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और सन् 1976 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।
जैसे चिड़ियाँ अपने नीड़ (घोंसले) बार-बार बनाती हैं और मनुष्य नये-नये घर बनाते रहते हैं — वैसे ही प्राणी की जीने की इच्छा अदम्य है। नीड़ या घर बार-बार टूटने पर भी पक्षी और मनुष्य उसे फिर-फिर बनाते रहते हैं। आँधी-तूफान आता है, घना अंधेरा छा जाता है, बड़े-बड़े पेड़ और मजबूत मकान तक गिर जाते हैं, तिनकों के घोंसले बिखर जाते हैं — पर उसी समय एक छोटी-सी चिड़िया नये जीवन की आशा लेकर आकाश में उड़ जाती है, वह विपत्ति से डरती नहीं। आकाश के भयानक दाँतों (वज्रपात, आँधी, तूफान, घने बादल) के बीच भी उषा मुस्कुराती है और चिड़िया चोंच में तिनका लेकर उड़ती हुई प्रचंड हवाओं (उनचास पवन) की भी परवाह नहीं करती। नाश से दुःख तो होता है, पर निर्माण/सृजन का सुख उसे दबा देता है। प्रलय के बाद भी फिर से नयी सृष्टि के गीत गाए जाते हैं — प्राणी मरता नहीं, बार-बार जीता है; इसी जीने को ‘जीवन’ कहते हैं। कविता विपत्ति में निडर होकर, निराश हुए बिना फिर-फिर निर्माण करते रहने की प्रेरणा देती है।
नीड़ का निर्माण फिर-फिर नेह का आह्वान फिर-फिर। वह उठी आँधी कि नभ में छा गया सहसा अंधेरा, धूलि-धूसर बादलों ने भूमि को इस भाँति घेरा। रात सा दिन हो गया, फिर रात आई और काली, लग रहा था अब न होगा इस निशा का फिर सबेरा, रात के उत्पात-भय से भीत जन-जन, भीत कण-कण, किन्तु प्राची से उषा की मोहिनी मुसकान फिर-फिर। नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर।
बह चले झोंके कि काँपे भीम कायावान भूधर, जड़ समेत उखड़-पुखड़ कर गिर पड़े, टूटे विटप वर। हाय तिनकों से विनिर्मित घोंसलों पर क्या न बीती! डग मगाए जब कि कंकड़, ईंट, पत्थर के महल-घर। बोल आशा के विहंगम, किस जगह पर तू छिपा था, जो गगन पर चढ़ उठाता गर्व से निज वक्ष फिर-फिर! नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर!
क्रुद्ध नभ के बज्रदंतों में उषा है मुस्कुराती, घोर गर्जन-भय गगन के कंठ से खग-पंक्ति गाती। एक चिड़िया चोंच में तिनका लिए जो जा रही है, वह सहज में ही पवन उंचास को नीचा दिखाती! नाश के दुख से कभी दबता नहीं निर्माण का सुख, प्रलय की निस्तब्धता से सृष्टि का नव गान फिर-फिर! नीड़ का निर्माण फिर-फिर नेह का आह्वान फिर-फिर।
शब्दार्थ: नीड़ = घोंसला, रहने/ठहरने की जगह। नेह = प्रेम, स्नेह। आह्वान = बुलावा। निशा = रात्रि। उत्पात = उपद्रव। भीत = डरा हुआ। प्राची = पूर्व दिशा। मोहिनी = मोह लेनेवाली, आकर्षक। मुसकान = मृदुहास। भीम कायावान = बड़े शरीर वाले। भूधर = पहाड़। विटप = पेड़, वृक्ष। वर = श्रेष्ठ। विनिर्मित = बना हुआ। विहंगम/विहग = पक्षी। बज्र = भीषण, कठोर। क्रुद्ध = नाराज। उषा = प्रातः। खगपंक्ति = पक्षियों की कतार। पवन उनचास = अनेक प्रकार की हवाएँ (ऋग्वेद में वायु-देवताओं की संख्या उनचास कही गई है)। प्रलय = सृष्टि का नाश। निस्तब्धता = खामोशी, नीरवता।
मुख्य भाव: कवि बार-बार दुहराते हैं — ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर’। अर्थात् घोंसला (जीवन/घर) चाहे कितनी बार टूटे, उसका निर्माण फिर-फिर होता है और प्रेम (नेह) का बुलावा भी बार-बार आता है। जीवन में विपत्ति रूपी आँधी आती है — आकाश में अचानक अंधेरा छा जाता है, धूल भरे बादल धरती को घेर लेते हैं, दिन रात-सा हो जाता है और लगता है कि इस रात का सवेरा ही नहीं होगा; हर प्राणी (जन-जन, कण-कण) भयभीत हो जाता है। किन्तु पूर्व दिशा (प्राची) से उषा की मोहिनी मुस्कान फिर-फिर प्रकट होती है — अर्थात् निराशा के बाद आशा और सवेरा अवश्य आता है।
दूसरा पद: तेज हवा के झोंकों से बड़े-बड़े पहाड़ तक काँप उठते हैं, श्रेष्ठ पेड़ जड़ समेत उखड़कर गिर पड़ते हैं; तिनकों से बने घोंसलों पर तो न जाने क्या बीतती है, और ईंट-पत्थर के मजबूत महल तक डगमगा जाते हैं। फिर भी कवि आशा रूपी पक्षी को ललकारते हैं — हे आशा के पक्षी! तू कहाँ छिपा था, जो अब फिर गर्व से अपना सीना ताने आकाश में उड़ रहा है? अर्थात् विपत्ति के बाद भी आशा फिर जाग उठती है और निर्माण का कार्य फिर शुरू होता है।
तीसरा पद: क्रोधित आकाश के वज्र रूपी दाँतों के बीच भी उषा मुस्कुराती है, और घोर गर्जना के भय के बीच भी पक्षियों की कतार गाती रहती है। एक छोटी-सी चिड़िया चोंच में तिनका लेकर उड़ती हुई प्रचंड उनचास पवनों (हवाओं) को भी सहज ही नीचा दिखा देती है — अर्थात् छोटा-सा प्राणी भी अपने साहस से बड़ी विपत्ति को हरा देता है। नाश के दुःख से निर्माण का सुख कभी नहीं दबता; प्रलय की खामोशी (निस्तब्धता) के बाद भी सृष्टि का नया गीत फिर-फिर गाया जाता है। यही निरंतर जीना ही सच्चा जीवन है।
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